पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूपी) के जनसंचार और मीडिया अध्ययन विभाग ने "पोस्ट-ट्रुथ युग में न्यू मीडिया" विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। यह व्याख्यान फुलब्राइट-नेहरू फेलो और साउथ प्यूजेट साउंड कम्युनिटी कॉलेज, ओलंपिया, यूएसए के संकाय डॉ. पारख हून द्वारा प्रस्तुत किया गया।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राघवेंद्र प्रसाद तिवारी के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम में तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई। अपने संबोधन में डॉ. हून ने इस बात पर बल दिया कि एक प्रभावी लोकतांत्रिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए विश्वास और तथ्यात्मक सटीकता महत्वपूर्ण कारक हैं क्योंकि वे नागरिकों को सूचित निर्णय लेने, उनके सामाजिक जुड़ाव को मज़बूत करने और चुने गए प्रतिनिधियों की समाज के प्रति जवाबदेही को सुनिश्चित करते हैं।
उन्होंने संस्थानों में घटते विश्वास और तथ्यों के बजाय भावनात्मक अपीलों की ओर बढ़ते रुझान पर प्रकाश डाला, जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे न्यू मीडिया प्लेटफार्मों ने सूचना तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण तो किया है लेकिन इन पर कोई निगरानी न होने के कारण यह न्यू मीडिया प्लेटफार्म गलत सूचनाओं को बढाने, सामाजिक ध्रुवीकरण को गहरा करने और लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने का कारण भी बन रहे हैं।
विशेष रूप से मध्यम आय वाले देशों में न्यू मीडिया प्लेटफार्मों के उदय से समाज में गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने का संकट और बढ़ गया है। व्याख्यान के दौरान डॉ. हून ने पारंपरिक और न्यू मीडिया के बीच मौलिक अंतर समझाए।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक मीडिया पेशेवर पत्रकारिता और संपादकीय देखरेख पर आधारित है, जबकि न्यू मीडिया उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री और इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म पर आधारित है। इस बदलाव ने दर्शकों को प्रोड्यूसर्स और कंज्यूमर्स (प्रोस्यूमर्स) में बदल दिया है, जो सामग्री को सक्रिय रूप से तैयार करते हैं और फैलाते हैं।
हालांकि इस बदलाव ने नागरिकों को सशक्त तो बनाया है, लेकिन यह उनमें फेक न्यूज और अप्रमाणित जानकारी का सेवन को भी बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने गलत जानकारी के विभिन्न प्रकारों जैसे व्यंग्य, भ्रामक सामग्री, फर्जी स्रोत और डेटा में हेरफेर के बारे में बताते हुए डीपफेक जैसे उभरते खतरों पर भी प्रकाश डाला।
डॉ. हून ने फर्जी खबरों, गलत सूचना और दुष्प्रचार की इन चुनौतियों से निपटने के लिए मीडिया उपभोग में विविधता लाने, मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देने और सार्वजनिक विश्वास बढ़ाने के लिए जमीनी स्तर पर तथ्य-जांच पहल का समर्थन करने जैसे समाधान प्रस्तावित किए।
उन्होंने गलत सूचना को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए तथ्य-जांच चैटबॉट जैसे एआई-संचालित टूल का उपयोग करने के महत्व पर भी प्रकाश डाला। डॉ. हून ने ध्रुवीकरण और गलत सूचना के नकारात्मक प्रभावों का मुकाबला करने के लिए नैतिक रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर बल देते हुए मीडिया प्लेटफार्मों से विज्ञापन राजस्व से प्रेरित सनसनीखेज पत्रकारिता को नकारते हुए अपने पत्रकारिता में जवाबदेही और समावेशिता को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
कार्यक्रम की शुरुआत जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. रुबल कनोज़िया के स्वागत भाषण से हुई। अंत में सूचना और संचार अध्ययन विद्यापीठ के डीन डॉ. भवनाथ पाण्डेय ने डॉ. हून को आभार व्यक्त किया।
इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य प्रो. बावा सिंह, प्रो. शाहिला ज़फर, डॉ. किंशुक पाठक, डॉ. परमवीर सिंह, डॉ. छवि गर्ग, डॉ. महेश मीणा, और डॉ. अलीम खान विशेष रूप से उपस्थित रहे। विभिन्न विभागों के छात्रों और शोधकर्ताओं ने भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।