संत निरंकारी सत्संग भवन गढ़दीवाला में मुखी महात्मा मोहन लाल जी के नेतृत्व में संत समागम करवाया गया। जिसमें दिल्ली से बने कार्यक्रम के तहत निरंकारी मिशन के प्रचारक महात्मा विजय सरूप जी पटियाला से विशेष तौर पर पहुंचे। उन्होंने प्रवचन करते हुए कहा कि मानव जीवन मनुष्य को इस निरंकार की जानकारी के लिए मिला है लेकिन इंसान माया के पीछे दौड़ कर 84 लाख योनियों के बाद मिले अनमोल जीवन को गवां कर चला जाता है। समय समय पर संतो महात्माओं ने इंसान को सतगुरु की शरण में जाकर परमात्मा की जानकारी हासिल करके अपने आने जाने के दुख की समाप्ति करने का संदेश देते रहे है। जो इंसान उनकी बातों पर अमल करके पूर्ण सतगुरु की शरण में चले जाते है उनका आना जाना सफल हो जाता है। उन्होंने धर्म की परिभाषा के बारे में बताते हुए कहा कि धर्म हमेशा इंसान को दूसरे इंसान से जोडऩे, प्यार, निर्मता, सहनशीलता जैसे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि जो इंसान इस निराकार की जानकारी हासिल कर लेता है वह महापुरुष बन जाता है, उसके जीवन में बदलाव आ जाता है। उन्होंने कहा कि वैर,विरोध, नफरत, निंदा,चुगली से कभी भी कोई भी सुख हासिल नहीं कर सकता है, यह चीजें हमेशा इंसान का नुक्सान करती है। इंसान का सबसे बड़ा दुख जन्म मरण का दुख है, जो सतगुरु की शरण में जाकर इस निराकार की जानकारी करके दुख को मिटाया जा सकता है। इस अवसर पर मुखी महात्मा मोहन लाल जी ने आए संतो महात्माओं व संगत का धन्यवाद किया। मिशन के महान कवि वचित्र पारस व अन्य वक्ताओं ने अपने विचार पेश किए। मंच सचिव की भूमिका महात्मा सतपाल सिंह जी ने निभाई। इस अवसर पर कपूरथला के क्षेत्रीय संचालक सरूप सिंह जी, प्रकाश सिंह दसूहा, महात्मा दलजीत सिंह, रणधीर सिंह, अमनदीप सिंह, संचालक सुरजीत सिंह, शिक्षक अवतार सिंह, सुखबीर सिंह व डा. सुखदेव सिंह दोनों सहायक शिक्षक, डा. रतन सिंह हरियाना मुखी व अन्य उपस्थित थे।