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मौजूदा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस व भाजपा चार चौराहों पर दिखी

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5 दरिया न्यूज (विजयेन्दर शर्मा)

शिमला , 16 Dec 2012

Last updated on: Dec 16, 2012, 00:00 IST

मौजूदा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस व भाजपा चार चौराहों पर दिखी। दोनों ही दलों को जहां गुटबाजी ने भेदकर रखा, वहीं आंतरिक विरोध के चलते जगहंसाई भी कम नहीं हुई। ऐसी ही खामियों के नतीजतन चुनाव संपन्न होने तक दोनों दल खामियाजा भुगतते रहे। भाजपा में हालांकि आंतरिक विरोध था, मगर उसे ज्यादा सार्वजनिक नहीं होने दिया गया। पहले संगठनात्मक गतिविधियों पर खींचतान दिखी, तो उसके बाद टिकट आबंटन में दिग्गज नेता जंग में जुटे रहे। हालांकि बाद में संसदीय क्षेत्रों के बंटवारे ने धूमल व शांता के बीच चले शीत युद्ध को शांत किया। इस सियासी युद्ध में वरिष्ठ नेताओं के चहेतों की भी राजनीतिक बलि चढ़ी। यही वजह रही कि बागी सामने आए और अब उन्हें लेकर रणनीतियां भी बनती दिख रही हैं। कांगड़ा, चंबा और मंडी को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है। टिकटों की यह जंग कितनी पैनी थी, इसकी मिसाल इस बात से भी ली जा सकती है कि 12 टिकट भाजपा को काफी लेटलतीफी से घोषित करने पड़े। सत्ताधारी दल को इस चुनाव में नकारात्मक वोट बैंक से भी जूझना पड़ सकता है। हर सरकार के खिलाफ पांच वर्षों के दौरान एंटी इन्कमबैंसी फैक्टर सक्रिय होता है। यह दीगर है कि यह किस हद तक भाजपा सरकार के दावों के बीच कारगर रहता है, मगर चर्चाओं के अनुरूप कांगड़ा जैसे बड़े जिला में इसके प्रभावी होने का आकलन किया जा रहा है। भाजपा को चौथा चौराहा हिलोपा की शक्ल में उसी के वरिष्ठ नेता महेश्वर सिंह ने दिखाया। भले ही प्रचार में यह क्षेत्रीय दल पैनापन नहीं दिखा पाया, मगर यह स्पष्ट है कि इस चुनाव में बंटवारा भाजपा के वोट बैंक का ही हुआ है। गुटबाजी पर नानुकर करने वाले भाजपा नेता टिकट आबंटन को लेकर सत्ता की दावेदारी पर अब भी बंटते हुए दिख रहे हैं। उधर, कांग्रेस में भी गुटबाजी बरकरार है। टिकट आबंटन से लेकर प्रचार तक में बंटी हुई कांग्रेस ने आम वर्कर के लिए दिक्कतें ही पेश की। मेरे-तेरे की इस राजनीति में नेता ही नहीं कार्यकर्ता भी पिसने को मजबूर दिखे हैं। भाजपा के सुनियोजित व आक्रामक प्रचार के आगे कांग्रेस का प्रचार धारदार नहीं रहा। वीरभद्र सिंह के साथ प्रदेश पार्टी मामलों के प्रभारी वीरेंद्र चौधरी को छोड़ दें तो अन्य नेता साथ नहीं चल सके। यह मनभेद का ही पैमाना रहा कि पार्टी के नेता प्रचार के दौरान अपनी डफली अपना राग अलापने को मजबूर रहे। मुद्दों को तलाशती रही कांग्रेस पर भाजपा ने इतने आक्रामक हमले बोले कि एकजुटता से उनका जवाब देने तक के लिए कांग्रेस मौजूद नहीं दिखी। कई मौकों पर वीरभद्र सिंह अकेली लड़ाई लड़ते दिखे। प्रदेश में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भावी मुख्यमंत्रियों की वह कतार है, जिसने पार्टी की एकजुटता को अभी तक तार-तार किया है। वीरभद्र सिंह के अलावा कौल सिंह ठाकुर, जीएस बाली, आशा कुमारी, विद्या स्टोक्स, विप्लव ठाकुर और अब सीडब्ल्यूसी के सदस्य धनीराम शांडिल का नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल हो चुका है। खास बात यह भी कि केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा का नाम भी लगातार सुर्खियों में रहने लगा है। इन चार चौराहों पर खड़े नेताओं के कारण पार्टी की लगातार जगहंसाई होती रही है।

भाजपा का संकट

 पार्टी का धूमल व शांता धड़ों में बंटना  आंतरिक विरोध में टिकट के लिए आपसी जंग  जनता में सरकार विरोधी लहर  एक धड़े का अलग होना और हिलोपा की स्थापना, इस तरह पार्टी का वोट बैंक बंट गया 

भाजपा को उम्मीद

 संकट के चौराहे से गुजर रही भाजपा को उम्मीद है कि बागियों का समर्थन हासिल कर लिया जाएगा और सीएम पद के लिए दावेदारी में ज्यादा भिड़ंत न होने के कारण सत्ता तक उसका रास्ता आसान हो जाएगा। 

कांग्रेस का संकट

 पार्टी का वीरभद्र और कौल धड़ों में बंटना, टिकटों के लिए नेताओं की आपसी भिड़ंत, केंद्र की कमजोरियां जैसे महंगाई, भ्रष्टाचार से पार्टी को क्षति की आशंका  प्रचार में एकजुटता नहीं दिखी, मंत्री पद के लिए नेता आपस में भिड़ते दिखे

कांग्रेस को उम्मीद

मुख्यमंत्री पद के लिए अनेक दावेदार होने के चलते यहां लड़ाई ज्यादा भीषण है, फिर भी पार्टी को आशा है कि हाइकमान के वरदहस्त से इस संकट को सुलझा लिया जाएगा

 

Tags: himachal election

 

 

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