जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में भूस्खलन की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र (Indian Himalayan Region - IHR) विशेष रूप से इस आपदा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जहां हर वर्ष अनेक ढलानों के ध्वस्त होने से जन-धन की भारी हानि होती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने एक पूर्णतः परिचालनात्मक लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम (LEWS) विकसित किया है।
इस शोध का नेतृत्व आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के प्रो. डेरिक्स प्रेज़ शुक्ला ने किया। इस शोध में उनके शोधार्थी अंकित सिंह और नितेश धीमान भी शामिल रहे। लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम (LEWS) एक ऐसी पूर्व चेतावनी प्रणाली है जो स्थलाकृति की संवेदनशीलता और वास्तविक समय (रियल-टाइम) वर्षा संबंधी आंकड़ों के आधार पर भूस्खलन की संभावना का पूर्वानुमान लगाती है।
यह प्रणाली संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए समय रहते चेतावनी जारी करती है, जिससे प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियां आवश्यक एहतियाती कदम उठा सकें। इस प्रणाली के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो. डेरिक्स प्रेज़ शुक्ला ने कहा, "मानसून की शुरुआत के साथ ही हमारा लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम (LEWS) वेब-आधारित एप्लिकेशन के माध्यम से प्रतिदिन भूस्खलन का पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है।
यह प्रणाली उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान करने में मदद करती है, जिससे प्रशासन और स्थानीय समुदाय समय पर निकासी एवं आपदा तैयारी जैसे आवश्यक कदम उठा सकें।" उन्होंने आगे कहा कि उपग्रह आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियां आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सबसे प्रभावी निवेशों में से एक हैं, क्योंकि ये वैज्ञानिक आंकड़ों को समय पर उपयोगी निर्णयों में बदलने में सक्षम बनाती हैं।
इस प्रकार का क्षेत्रीय स्तर का भूस्खलन पूर्वानुमान मंच विशेष रूप से मानसून के दौरान, जब भूस्खलन का खतरा सबसे अधिक होता है, आपदा प्रबंधन एजेंसियों की तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया और समन्वय को उल्लेखनीय रूप से मजबूत कर सकता है। भारत में उपलब्ध अन्य भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणालियों की तुलना में आईआईटी मंडी का LEWS पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र को कवर करता है, जिससे यह देश की सबसे व्यापक प्रणालियों में से एक बन गया है।
इस प्रणाली को शोधकर्ताओं ने बहु-स्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से विकसित किया। सबसे पहले भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के डेटाबेस से लगभग 26,000 भूस्खलन घटनाओं का विश्लेषण कर भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया गया। इसके लिए विभिन्न भूस्खलन कारकों को एन्सेम्बल मशीन लर्निंग मॉडल की सहायता से एकीकृत किया गया।
इसके बाद P-RIL (Probability of Rainfall-Induced Landslides) मॉडल विकसित किया गया, जिसमें NASA Global Landslide Catalogue और IMERG उपग्रह वर्षा डेटा से प्राप्त सात वर्षा मानकों का उपयोग किया गया। चूंकि वर्षा की स्थिति लगातार बदलती रहती है, इसलिए यह मॉडल पिछले 15 दिनों के वर्षा आंकड़ों के आधार पर गतिशील पूर्वानुमान प्रदान करता है।
अंतिम दैनिक भूस्खलन पूर्वानुमान स्थिर संवेदनशीलता मानचित्र और गतिशील P-RIL मॉडल को संभाव्यता विश्लेषण के माध्यम से एकीकृत कर तैयार किया जाता है। उपयोगकर्ताओं की सुविधा के लिए पूर्वानुमानों को विभिन्न जोखिम श्रेणियों (Risk Categories) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
हितधारकों तक जानकारी आसानी से पहुंचाने के लिए आईआईटी मंडी की टीम ने Google Earth Engine (GEE) आधारित वेब पोर्टल विकसित किया है। इसके माध्यम से उपयोगकर्ता वर्तमान दिन के साथ-साथ पिछले तीन दिनों के भूस्खलन पूर्वानुमान देख सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, वे PDF बुलेटिन डाउनलोड कर सकते हैं तथा चयनित स्थानों के लिए व्हाट्सएप अलर्ट भी प्राप्त कर सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम समय पर और स्थान-विशिष्ट चेतावनियां जारी कर भारतीय हिमालयी क्षेत्र में आपदा तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण को मजबूत करेगा तथा आर्थिक नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
आईआईटी मंडी के बारे में
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी, हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की कमांड घाटी में स्थित दूसरी पीढ़ी के अग्रणी आईआईटी संस्थानों में से एक है। यह भारत सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में शामिल है। पिछले एक दशक में संस्थान ने ₹120 करोड़ से अधिक मूल्य की 275 से अधिक अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं पर कार्य किया है तथा 11 अंतरराष्ट्रीय और 12 राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) किए हैं।