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हूल दिवस पर सिदो-कान्हू को श्रद्धांजलि, सीएम हेमंत सोरेन बोले- क्रांति की चिंगारी कभी नहीं बुझती

Hemant Soren, Chief Minister of Jharkhand, Jharkhand Mukti Morcha, Jharkhand, Ranchi, Babulal Marandi, Hul Diwas
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रांची , 30 Jun 2026

Last updated on: Jun 30, 2026, 14:46 IST

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 1855 में संथाल हूल का बिगुल फूंकने वाले अमर शहीद सिदो-कान्हू और उनके साथियों को मंगलवार को पूरे झारखंड में श्रद्धापूर्वक याद किया गया। हूल दिवस के अवसर पर मंगलवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी सहित कई लोगों ने रांची स्थित सिदो-कान्हू उद्यान पहुंचकर महान क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

सिदो-कान्हू के गांव साहिबगंज के भोगनाडीह स्थित क्रांति स्थल पर भी बड़ी संख्या में जुटे और शहीदों का स्मरण किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सिदो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद कहा कि हूल दिवस केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की चेतना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जिस दौर में शोषित समाज के सामने प्रतिरोध का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, उस समय सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा वीरांगनाओं फूलो-झानो ने परिणाम की चिंता किए बिना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज भी दुनिया में जहां कहीं भी कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष होता है, उसकी जड़ में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की वही भावना दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि झारखंड वीरों की धरती है और यहां के जननायकों का इतिहास सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। क्रांति की आग कभी बुझती नहीं है और न ही उसे बुझाया जा सकता है।

उसकी चिंगारी हमेशा जीवित रहती है। इस संदर्भ में उन्होंने दिल्ली के राजघाट और इंडिया गेट पर लगातार जलने वाली ज्योति का भी उल्लेख किया। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी सिदो-कान्हू पार्क पहुंचकर प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और हूल आंदोलन के सभी शहीदों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि वर्ष 1855 में संथाल परगना की धरती से शुरू हुआ हूल आंदोलन ब्रिटिश शासन की दमनकारी और शोषणकारी नीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक जनविद्रोह था।

मरांडी ने कहा कि सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू तथा वीरांगनाओं फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू के नेतृत्व में संथाल समाज ने जल, जंगल, जमीन और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया। उनके अनुसार, यह आंदोलन केवल अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए जनजागरण का प्रतीक बन गया। उन्होंने कहा कि हूल के अमर बलिदानियों का त्याग आज भी समाज को अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े होने और अपनी संस्कृति व अधिकारों की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।

 

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