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सुरों के सरताज लक्ष्मीकांत : 'प्यारेलाल' की दोस्ती ने बनाया सुपरहिट संगीतकार

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मुंबई , 24 May 2026

Last updated on: May 25, 2026, 11:53 IST

"चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, धीरे-धीरे..." या फिर "हंसता हुआ नूरानी चेहरा..." आज भी जब बजता है, तो उन दो संगीतकारों की याद आती है जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को उसका सबसे सुरीला 'स्वर्ण युग' दिया। हम बात कर रहे हैं लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर की। प्यारेलाल के साथ मिलकर उन्होंने लगभग साढ़े तीन दशकों तक भारतीय सिनेमा पर राज किया।

लक्ष्मीकांत का जन्म 3 नवंबर 1937 को मुंबई के विले पार्ले में हुआ था। वह दीपावली की रात थी, जब चारों तरफ दीपक जल रहे थे। लक्ष्मी पूजन का दिन होने के कारण माता-पिता ने 'लक्ष्मीकांत' नाम रखा। अभी उम्र बेहद छोटी थी कि सिर से पिता का साया उठ गया। परिवार कर्ज के दलदल में डूब गया और लक्ष्मीकांत को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

इस दौरान उनके पिता के एक संगीतकार मित्र ने सलाह दी, "बच्चों को संगीत सिखाओ, पेट पालने का कोई न कोई जरिया तो बन ही जाएगा।" बस, यहीं से मात्र दस वर्ष की उम्र में लक्ष्मीकांत के हाथों में मैंडोलिन आ गया। उन्होंने उस्ताद हुसैन अली और बाद में बाल मुकुंद इंदोरकर से इसकी बारीकियां सीखीं। उन्होंने 'भक्त पुंडलिक' (1949) जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में अभिनय भी किया।

लक्ष्मीकांत की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब कोलाबा के रेडियो क्लब में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान करीब 11 साल के इस लड़के को मैंडोलिन बजाते हुए खुद सुर कोकिला लता मंगेशकर ने देखा। लता मंगेशकर उस अद्भुत वादन को सुनकर दंग रह गईं। उन्होंने तुरंत लक्ष्मीकांत की पारिवारिक स्थिति जानी और शंकर-जयकिशन, एसडी बर्मन और नौशाद जैसे तत्कालीन दिग्गज संगीतकारों से उनकी सिफारिश की।

इसी संघर्ष के दौरान लक्ष्मीकांत की मुलाकात 'सुरीले बाल कला केंद्र' में प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा से हुई। प्यारेलाल खुद एक बेहतरीन वायलिन वादक थे, और उनके घर के हालात भी कुछ अच्छे नहीं थे। एक जैसी उम्र, एक सा संघर्ष और संगीत का वही जुनून। एक समय ऐसा भी आया जब तंगहाली से टूटकर प्यारेलाल देश छोड़कर वियना जाने की सोचने लगे थे।

तब लक्ष्मीकांत ने उनका हाथ थामा और बड़े लाड़ से कहा था, "घबराओ मत यार, हम दोनों मिलकर एक दिन इस इंडस्ट्री में अपना बहुत बड़ा नाम बनाएंगे।" साल 1963 में आई कम बजट की फिल्म 'पारसमणि' ने इस जोड़ी को रातोंरात मशहूर कर दिया। इसके बाद साल 1964 की फिल्म 'दोस्ती' ने तो इतिहास ही रच दिया। इस फिल्म के गानों ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया।

इसके बाद तो सफलता का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो थमने का नाम नहीं ले रहा था। शंकर-जयकिशन के दौर में इस जोड़ी ने राज कपूर की फिल्म 'बॉबी' (1973) के जरिए आधुनिक युवा संगीत की नई परिभाषा लिखी। चाहे 'सत्यम शिवम सुंदरम' का शास्त्रीय राग दरबारी हो, 'कर्ज' का थिरकता डिस्को संगीत, या 'तेजाब' और 'खलनायक' का गाना, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने हर दौर के बदलते मिजाज के हिसाब से गाने कंपोज किए। 

उन्होंने लगभग 750 फिल्मों के लिए 2,800 से अधिक गीतों की रचना की। व्यावसायिकता के चरम पर होने के बाद भी लक्ष्मीकांत जमीन से जुड़े रहे। वे जितने बड़े संगीतकार थे, उससे भी बड़े इंसान थे। निर्माता बोनी कपूर ने एक बार स्वीकार किया था कि वे इस जोड़ी को अधिक फीस देना चाहते थे, पर लक्ष्मीकांत ने यह कहकर मना कर दिया कि, "हर निर्माता इतना खर्च सहन नहीं कर सकता।"

गीतकार आनंद बख्शी के साथ उनकी जोड़ी शानदार थी। दोनों ने मिलकर लगभग 302 फिल्मों में यादगार गाने दिए। 25 मई 1998 को इस सुर-सम्राट ने आखिरी सांस ली। लक्ष्मीकांत के निधन के बाद प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा अकेले जरूर हो गए, लेकिन उन्होंने आज तक किसी भी मंच पर अकेले प्रस्तुति नहीं दी। वे जहां भी काम करते हैं, नाम हमेशा 'लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल' ही लिखते हैं।

 

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