Wednesday, 22 July 2026

 

 

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रेडियो खगोल विज्ञान के नए युग में भारत का प्रवेश: आईआईएसईआर मोहाली में एसके- इंडिया शिखर सम्मेलन का शुभारंभ

भारत विश्व की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन परियोजना के लिए वैज्ञानिक कार्ययोजना कर रहा है तैयार

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5 Dariya News

मोहाली , 16 Jan 2026

Last updated on: Jan 18, 2026, 12:33 IST

राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन “इंडिया एंड द एसकेए: खगोल भौतिकी में परिवर्तनकारी युग की तैयारी” का 15  जनवरी को आईआईएसईआर मोहाली में शुभारंभ हुआ। एसकेए (SKA) - इंडिया कंसोर्टियम (एसकेएआईसी (SKAIC) द्वारा आईआईएसईआर मोहाली के सहयोग से आयोजित यह महत्वपूर्ण आयोजन देश के लगभग 100 अग्रणी खगोल वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को एक मंच पर ला रहा है, ताकि विश्व की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन परियोजना के लिए भारत की वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार की जा सके।

जुलाई 2024 में भारत के स्क्वेयर किलोमीटर एरे ऑब्ज़र्वेटरी (एसकेएओ) का पूर्ण सदस्य बनने के बाद आयोजित यह सम्मेलन राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय को अवसंरचना योजना से आगे बढ़कर वैज्ञानिक कार्यान्वयन की दिशा में अग्रसर करने का कार्य कर रहा है। भारत सरकार ने इस अंतरराष्ट्रीय महाविज्ञान परियोजना में भागीदारी के लिए ₹1250 करोड़ की स्वीकृति प्रदान की है, जिसे परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित किया जा रहा है। 

इस परियोजना के लिए टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान के अंतर्गत राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र (एनसीआरए-टीआईएफआर) को नोडल संस्था नामित किया गया है।चार दिवसीय इस शिखर सम्मेलन में 40 से अधिक तकनीकी व्याख्यान, 25 पोस्टर प्रस्तुतियाँ तथा संवादात्मक चर्चा सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक कार्यक्रम में हमारे सूर्य के अध्ययन से लेकर आकाशगंगा के तारों, फास्ट रेडियो बर्स्ट्स के रहस्य, दूरस्थ आकाशगंगाओं के विकास तथा प्रारंभिक ब्रह्मांड में प्रथम तारों की खोज जैसे विविध विषय शामिल हैं।

नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के केंद्र निदेशक एवं एसकेएओ परिषद में भारत के विज्ञान प्रतिनिधि प्रो. यशवंत गुप्ता ने सम्मेलन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “एसकेए (SKA) दूरबीनों से विज्ञान सत्यापन (साइंस वेरीफिकेशन) आँकड़े अगले वर्ष तक मिलने की संभावना है। ऐसे में हम एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण पर खड़े हैं। यह भारतीय वैज्ञानिक समुदाय के एकजुट होकर रणनीति बनाने का सर्वोत्तम समय है। 

हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वरिष्ठ वैज्ञानिकों से लेकर पीएचडी विद्यार्थियों तक सभी शोधकर्ता इस परिवर्तनकारी डेटा का अधिकतम दक्षता और प्रभाव के साथ उपयोग कर सकें, जिससे वैश्विक रेडियो खगोल विज्ञान में भारत की भूमिका और सशक्त हो।”सम्मेलन की वैज्ञानिक आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. तीर्थंकर रॉय चौधरी, नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (एनसीआरए-टीआईएफआर) ने कहा कि “यह बैठक वैज्ञानिकों की पीढ़ियों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य कर रही है। 

जहाँ वरिष्ठ विशेषज्ञ रणनीतिक चर्चाओं का नेतृत्व कर रहे हैं, वहीं प्रतिभागियों का एक बड़ा हिस्सा प्रारंभिक करियर के शोधकर्ताओं और पीएचडी विद्यार्थियों का है। यही युवा वैज्ञानिक भविष्य में एसकेएओ (SKAO) के प्रमुख उपयोगकर्ता होंगे। यह सम्मेलन उन्हें प्रशिक्षण और सहयोगात्मक नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए आयोजित किया गया है, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय प्रमुख विज्ञान परियोजनाओं का नेतृत्व कर सकें।”

आईआईएसईआर मोहाली के प्रो. जसजीत सिंह बगला ने बताया कि भारत में एसकेए (SKA) विज्ञान पर पहली बैठक मार्च 2014 में आईआईएसईआर मोहाली में ही, खगोल विज्ञान सोसाइटी ऑफ इंडिया की वार्षिक बैठक के दौरान आयोजित की गई थी। उसी पहल से एक वर्ष बाद एसकेए (SKA)-इंडिया कंसोर्टियम का गठन हुआ। ऐसे में यह अत्यंत उपयुक्त है कि कंसोर्टियम की पहली औपचारिक विज्ञान बैठक भी इसी स्थान पर आयोजित हो रही है।

एसकेए (SKA) -इंडिया कंसोर्टियम (एसकेएआईसी (SKAIC) के बारे में

भारत में एसकेए से संबंधित सभी गतिविधियों का समन्वय एसकेए -इंडिया कंसोर्टियम द्वारा किया जाता है। इसमें 24 सदस्य संस्थान शामिल हैं, जिनमें प्रमुख शोध संस्थान, आईआईटी, आईआईएसईआर और प्रमुख विश्वविद्यालय सम्मिलित हैं। एसकेएआईसी, एसकेए परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक, तकनीकी, प्रशिक्षण एवं जनसंपर्क प्रयासों का संचालन करता है, जिससे देश स्तर पर एक समन्वित और एकीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित हो सके।

एसकेएओ (SKAO) और भारत की भागीदारी

स्क्वेयर किलोमीटर एरे ऑब्ज़र्वेटरी (एसकेएओ) दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में विश्व की सबसे बड़ी और सर्वाधिक संवेदनशील रेडियो दूरबीनों के निर्माण की एक अंतरराष्ट्रीय पहल है। परमाणु ऊर्जा विभाग और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वित्तपोषित भारत की भागीदारी में टेलीस्कोप का “ब्रेन” कहे जाने वाले उन्नत सॉफ़्टवेयर और नियंत्रण प्रणालियों में महत्वपूर्ण योगदान शामिल है, जो ब्रह्मांड से प्राप्त अभूतपूर्व मात्रा में डेटा के प्रसंस्करण के लिए आवश्यक हैं।

 

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