Monday, 29 June 2026

 

 

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हरियाणा के जल अधिकारों का सौदा नहीं होने देंगे, एक-एक बूंद की रक्षा के लिए लड़ेगी इनेलो: प्रो. संपत सिंह

दिल्ली में आज बीजेपी ने जो हरियाणा और राजस्थान के बीच जल समझौता किया है इसका इनेलो पूरजोर विरोध करती है

Prof Sampat Singh, Indian National Lok Dal, Haryana, INLD
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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

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चंडीगढ़ , 29 Jun 2026

Last updated on: Jun 29, 2026, 15:59 IST

पूर्व वित्त मंत्री एवं इंडियन नेशनल लोकदल के राष्ट्रीय संरक्षक प्रो. संपत सिंह ने सोमवार को चंडीगढ़ स्थित पार्टी मुख्यालय पर प्रेस वार्ता कर कहा कि इनेलो हमेशा हरियाणा के जल अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ता रहा है और राज्य के यमुना जल में उसके वैधानिक हिस्से पर किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करेगा। दिल्ली में आज बीजेपी ने जो हरियाणा और राजस्थान के बीच जल समझौता किया है इसका इनेलो पूरजोर विरोध करती है। 

दूसरी ओर, एस.वाई.एल. नहर का निर्माण भी सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार निर्देशों के बावजूद अधूरा है, जिससे हरियाणा को लगातार जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी औऱ कांग्रेस दोनों पार्टियां हरियाणा के पानी के मामले में एक हो चुकी हंै। 

कांग्रेस ने जैसे कुर्सी बचाने के लिए समझौता किया था उसी तर्ज पर आज बीजेपी सरकार ने राजस्थान को पानी देने का समझौता किया है। हरियाणा का पानी हरियाणा का है। इनेलो उसकी एक-एक बूंद की रक्षा के लिए लड़ती रहेगी। उन्होंने कहा कि 12 मार्च, 1954 को तत्कालीन पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच हुए यमुना जल समझौते में पूर्वी एवं पश्चिमी यमुना नहर प्रणाली के माध्यम से पंजाब के अधिकार को मान्यता दी गई थी। 

वर्ष 1966 में हरियाणा के गठन के बाद यह अधिकार हरियाणा को प्राप्त हुआ। कई दशकों तक लगभग 12 बीसीएम यमुना जल का उपयोग हुआ, जिसमें हरियाणा लगभग 8 बीसीएम तथा उत्तर प्रदेश लगभग 4 बीसीएम जल का उपयोग करता रहा। किन्तु 12 मई, 1994 को केंद्र सरकार की पहल पर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली के मुख्यमंत्रियों द्वारा किए गए नए समझौते के तहत हरियाणा का हिस्सा घटाकर 5.730 बीसीएम कर दिया गया, जबकि उत्तर प्रदेश को 4.032 बीसीएम, राजस्थान को 1.119 बीसीएम, दिल्ली को 0.724 बीसीएम तथा हिमाचल प्रदेश को 0.378 बीसीएम आवंटित किया गया। 

इससे हरियाणा की हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत से घटकर 46 प्रतिशत रह गई। इससे पहले राजस्थान और दिल्ली को केवल अतिरिक्त उपलब्ध जल मानवीय आधार पर दिया जाता था, जिसे 1994 के समझौते ने स्थायी आवंटन का रूप दे दिया।

प्रो. संपत सिंह ने कहा कि इसी समझौते में यमुना जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए रेणुका, किशाऊ तथा लखवार-व्यासी बांधों के निर्माण का भी प्रावधान किया गया था, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद ये परियोजनाएं आज तक पूरी नहीं हो सकीं। उन्होंने कहा कि 1978 की भीषण बाढ़ के बाद 1989 में साहिबी, कृष्णावती एवं अन्य मौसमी नदियों के जल का सिंचाई के लिए उपयोग करने के उद्देश्य से हरियाणा सरकार ने लगभग 69 करोड़ रुपये की लागत से मसानी जलाशय का निर्माण कराया। 

बाद में राजस्थान ने ऊपरी क्षेत्र में कच्चे बांध बनाकर प्राकृतिक जल प्रवाह को रोक दिया, जिससे हरियाणा की सिंचाई क्षमता प्रभावित हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि इन पुराने विवादों का समाधान करने के बजाय वर्तमान भाजपा सरकार राजस्थान के साथ ऐसे नए समझौते कर रही है, जो हरियाणा के हितों को और कमजोर करते हैं।

प्रो. संपत सिंह ने कहा कि 1994 में स्वर्गीय चौधरी ओम प्रकाश चौटाला के नेतृत्व में यमुना जल समझौते के विरोध में इनेलो के सभी 17 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इसे हरियाणा के जल अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी राजनीतिक दल द्वारा दिया गया सबसे बड़ा बलिदान बताया।

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही हरियाणा के वैध जल अधिकारों की प्रभावी रक्षा करने में विफल रही हैं। इनेलो लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीकों से हरियाणा के हितों की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी। प्रो. संपत सिंह ने बताया कि शीघ्र ही चैधरी अभय सिंह चौटाला के नेतृत्व में पार्टी की बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें आगामी कदम का फैसला किया जाएगा।

 

Tags: Prof Sampat Singh , Indian National Lok Dal , Haryana , INLD

 

 

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