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जब पेट पालने को मेहदी हसन बने साइकिल मैकेनिक, 10 साल के संघर्ष के बाद ऐसे मिला 'शहंशाह-ए-गजल' का खिताब

Music, Mehdi Hassan, Mumbai
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Armaan

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5 Dariya News

मुंबई , 12 Jun 2026

Last updated on: Jun 12, 2026, 17:14 IST

संगीत की दुनिया में मेहदी हसन को 'शहंशाह-ए-गजल' के नाम से जाना जाता है। उनकी आवाज में दर्द और मिठास इस कदर होती थी कि सुनने वाला उनकी गजलों में खो जाता था। उन्होंने अपनी जिंदगी में गरीबी और संघर्ष का ऐसा दौर भी देखा था, जब उन्हें परिवार का पेट पालने के लिए साइकिल मैकेनिक का काम करना पड़ा था।

यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। 13 जून 2012 को उन्होंने अंतिम सांस ली लेकिन उनका सफर दिखाता है कि कोई भी मुश्किल मंजिल तक पहुंचने से रोक नहीं सकती। मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना गांव में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ियों से संगीत से जुड़ा हुआ था।

उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान अपने समय के जाने-माने शास्त्रीय गायक थे। घर का माहौल पूरी तरह संगीत से भरा हुआ था। यही कारण था कि मेहदी हसन ने बहुत छोटी उम्र में ही संगीत सीखना शुरू कर दिया। जब मोहल्ले के बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते थे, तब मेहदी घंटों रियाज किया करते थे।

आठ साल की उम्र से उन्होंने संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते ध्रुपद, ठुमरी और खयाल जैसी गायकी में महारत हासिल कर ली। हालांकि, उनकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर 1947 में आया। भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उन्हें अपना घर छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा। वहां पहुंचने के बाद हालात बिल्कुल बदल चुके थे।

परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। ऐसे समय में मेहदी हसन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परिवार को संभालने की थी। मजबूरी में उन्होंने एक साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया। बाद में उन्होंने कार और ट्रैक्टर ठीक करने का काम भी किया। दिनभर मेहनत करके पैसे कमाते और रात को संगीत का अभ्यास करते।

गरीबी और कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने हर हाल में रियाज जारी रखा। करीब दस साल तक संघर्ष करने के बाद उनकी मेहनत रंग लाई। साल 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का मौका मिला। शुरुआत में उन्होंने ठुमरी गाई और उनकी आवाज को लोगों ने काफी पसंद किया। धीरे-धीरे उन्होंने गजल गायकी की ओर कदम बढ़ाया।

उनकी अनोखी शैली और दिल को छू लेने वाली आवाज ने उन्हें जल्द ही लोकप्रिय बना दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेहदी हसन की गाई गजलें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में बेहद पसंद की जाने लगीं। 'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां हो गए' और 'अब के हम बिछड़े' जैसी गजलें आज भी लोगों की पसंदीदा हैं।

महान गायिका लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं। उनकी कला और योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान भी मिले। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस', 'तमगा-ए-इम्तियाज', 'हिलाल-ए-इम्तियाज' और 'निशान-ए-इम्तियाज' जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया।

भारत में भी उन्हें  1979 में के.एल. सहगल पुरस्कार से नवाजा गया। नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिण बाहु सम्मान प्रदान किया था। मेहदी हसन ने अपने जीवन में दो शादियां कीं और उनका बड़ा परिवार था। उनके कई बच्चों ने भी संगीत को ही अपना करियर बनाया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वह लंबे समय तक बीमार रहे लेकिन संगीत से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। 13 जून 2012 को कराची में उनका निधन हो गया।

 

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