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चंद्रशेखर आजाद पुण्यतिथि : अल्फ्रेड पार्क में अंतिम गोली से निभाया ‘आजाद’ रहने का प्रण

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नई दिल्ली , 26 Feb 2026

Last updated on: Feb 26, 2026, 17:47 IST

"दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।" यह चंद्रशेखर आजाद के शब्द मात्र नहीं थे, बल्कि यह भारत भूमि के लिए मर मिटने का प्रण था। फौलाद सा शरीर, मूंछों पर ताव और चेहरे पर तेज वाले चंद्रशेखर आजाद की आंखों में आजादी का सपना था। वे ऐसे वीर सपूत थे, जिन्होंने अपनी बहादुरी और साहस की कहानी खुद लिखी।

27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि है। 1920 से 1930 के दशक में जब अंग्रेजी हुकूमत का दमन चरम पर था, उस वक्त चंद्रशेखर आजाद जैसे मतवालों ने आजादी की वो अलख जगाई, जिसने गोरी हुकूमत की जड़ों को हिलाकर रख दिया। 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा में जन्मे चंद्रशेखर के सीने में बचपन से ऐसी मशाल जल रही थी कि उन्होंने पुलिस की बर्बरता का विरोध प्रकट करते हुए एक अंग्रेज अफसर के सिर पर पत्थर दे मारा था।

महज 14 साल की उम्र में महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'आजादी' और पता 'जेल खाना' बताया। उम्र कम थी। ऐसे में अंग्रेज मजिस्ट्रेट चाहकर भी उन्हें चारदीवारी के अंदर की खौफनाक सजा नहीं सुना सकता था। इसलिए खीजकर 15 कोड़े की सजा सुनाई।

हर कोड़े की मार पर दर्द नहीं था, बल्कि जुबान से 'भारत माता की जय' नारा निकला। यह एक ऐसी घटना भी थी, जिससे बालक चंद्रशेखर तिवारी का नाम 'चंद्रशेखर आजाद' पड़ा। इतिहासकार कपिल कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा, चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी की तरफ से अपने आंदोलन को वापस लेने के निर्णय ने चंद्रशेखर आजाद को क्रांतिकारी बनाया, क्योंकि वे समझ गए थे कि अहिंसावादी तरीके से अंग्रेजों पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।"

उनका मानना था कि अगर आपके लहू में रोष नहीं है, तो ये पानी है जो आपकी रगों में बह रहा है। ऐसी जवानी का क्या मतलब अगर वह मातृभूमि के काम न आए? जब असहयोग आंदोलन को वापस लिया जाने लगा और अंग्रेजों की बर्बरता हद से बाहर होने लगी, तो वे सशस्त्र क्रांति की सोच को लेकर चंद्रशेखर आजाद आगे बढ़े।

वे बहुत जल्द युवाओं के आदर्श बन चुके थे। अपनी बुद्धिमता से अंग्रेजों को चकमा देते रहे और नई-नई योजना बनाकर युवाओं को एकजुट करते रहे। उन्होंने भगत सिंह के साथ मिलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' का गठन किया। इसके साथ-साथ आजाद ने अन्य क्रांतिकारी सदस्यों के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारत से भगाने का हरसंभव प्रयास किया। 

इतिहासकार कपिल कुमार ने इस बारे में कहा, "पहले हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य क्रांतिकारी तरीकों से देश के अंदर गणतंत्र की स्थापना करना था, जिसका नाम 'हिंदुस्तान रिपब्लिक' रखना था। हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का मतलब था कि यह क्रांतिकारी उसकी सेना है।" वे कहते थे, "चिंगारी आजादी की सुलगी मेरे जश्न में है, इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं। 

मौत जहां जन्नत हो ये बात मेरे वतन में है, कुर्बानी का जज्बा जिंदा मेरे कफन में है।" वे स्वाधीनता संग्राम को एक नए आयाम तक पहुंचा चुके थे। आजाद 'काकोरी' की धरपकड़ और मुकदमे के दौरान पुलिस की बहुत कोशिशों के बाद भी हाथ नहीं आए। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। उनका प्रण था कि 'आखिरी सांस' तक उन्हें कोई जिंदा पकड़ न सके। 

वे कभी अंग्रेजों के आगे आत्मसमर्पण नहीं कर सकते थे। 27 फरवरी 1931 को मुखबिर की सूचना पर ब्रिटिश पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया था। उन्होंने बहादुरी से पुलिस का मुकाबला किया। इतिहासकार कपिल कुमार कहते हैं, "अंग्रेजों ने इस देश में कोई भी युद्ध बिना गद्दारों के नहीं जीता।

क्रांतिकारियों के साथ यही हाल हुआ था। किसी न किसी ने क्रांतिकारियों की मुखबिरी की।" उनके अनुसार, जब चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद में थे, वे किसी के घर से आ रहे थे। यहां लोगों को मालूम था कि ये चंद्रशेखर आजाद हैं। सुखदेव से उनकी मुलाकात होनी थी। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया था और दोनों तरफ से गोलीबारी हुई।

इस संघर्ष पर जब आजाद को पता लग चुका था कि बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है, तो उन्होंने अपने प्रण को पूरा करने की ठान ली। अंग्रेजी हुकूमत के सामने जिंदा पकड़ा जाना उन्हें मंजूर नहीं था, इसलिए भीषण संघर्ष के बीच आखिरकार खुद को गोली मार ली और देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

आजादी की लड़ाई में अद्भुत वीरता का परिचय देने वाले देशभक्तों के कारण ही आज हम आजाद हैं। भारत की हवा में आज भी उन मतवालों की महक है और आजादी के हर एहसास में उस क्रांति की धमक है। इन मतवालों में चंद्रशेखर आजाद का नाम सबसे रोशन है।

 

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