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फिगर स्केटिंग : प्रागैतिहासिक काल का आविष्कार, विंटर ओलंपिक के कलात्मक खेलों में बना एक

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नई दिल्ली , 31 Dec 2025

Last updated on: Jan 01, 2026, 12:04 IST

बर्फ पर खेले जाने वाले 'फिगर स्केटिंग' को कलात्मक खेलों में जाना जाता है, जिसमें खिलाड़ी संगीत के साथ संतुलन, स्पिन, जंप और स्टेप्स का प्रदर्शन करते हुए मेडल जीतने की कोशिश करते हैं। तकनीक और कला का यह अनोखा मेल ओलंपिक का अहम हिस्सा माना जाता है। शीतकालीन ओलंपिक के सबसे पुराने गेम्स में शुमार इस खेल का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है, जहां हड्डियों के स्केट का इस्तेमाल होता था। 

3000 ईसा पूर्व के आसपास स्कैंडिनेविया और रूस में जानवरों की हड्डियों से बने स्केट्स के साक्ष्य पाए गए हैं। इसके बाद 13वीं-14वीं सदी में डच लोगों ने इस स्केट्स पर धारियां जोड़ीं, जिससे पैरों के साथ स्केट की पकड़ मजबूत बनी और बर्फ पर बेहतर ग्लाइडिंग संभव हुई।1740 के दशक में स्कॉटलैंड में पहला संगठित फिगर स्केटिंग क्लब बना। 

साल 1772 में रॉबर्ट जोंस ने 'ए ट्रीटीज ऑन स्केटिंग' नामक एक किताब में बर्फ पर आकृतियां बनाना सिखाया, जिन्हें 'आधुनिक फिगर स्केटिंग का जनक' कहा गया।1850 में एडवर्ड बुशनेल ने स्केट्स में स्टील ब्लेड जोड़े, जिससे जटिल चाल भी संभव हो सकी। 1860 के दशक में बैले मास्टर जैक्सन हेंस ने इस खेल में बैले और डांस को जोड़कर इसे कलात्मक बनाया। 

1891 में यूरोपीय चैंपियनशिप का आयोजन हुआ, जिसके करीब 5 साल बाद पहली वर्ल्ड चैंपियनशिप आयोजित हुई। साल 1902 में ब्रिटिश स्केटर मैज सियर्स पहली ऐसी महिला बनीं, जिन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में पुरुषों को चुनौती दी। इससे पहले इस चैंपियनशिप में सिर्फ पुरुष ही हिस्सा लेते थे, लेकिन मैज सियर्स ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया। 

इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्केटिंग संघ को साल 1908 में महिलाओं के लिए एक अलग चैंपियनशिप शुरू करनी पड़ी।इस खेल को 1908 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में शामिल किया गया था। मैज सियर्स ने इस ओलंपिक में हिस्सा लिया, जिसमें एकल स्पर्धा में गोल्ड और अपने पति के साथ युगल स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीता। 1972 तक, पुरुष और महिला एकल और युगल इवेंट होते थे। 

1976 में आइस डांस को इसमें शामिल किया गया।फिगर स्केटिंग को 5 स्पर्धाओं में बांटा गया है। मेंस और विमेंस सिंगल्स, पेयर्स (आर्टिस्टिक+डांस) और टीम इवेंट। भारत में फिगर स्केटिंग अभी शुरुआती दौर में है। हालांकि, उचित रणनीति के साथ ओलंपिक पदक की राह बनाई जा सकती है। इसके लिए युवा टैलेंट को पहचानना होगा। 

बच्चों को कम उम्र में ट्रेनिंग देनी शुरू करनी होगी। विदेशी कोच, कोरियोग्राफर और टेक्निकल एक्सपर्ट की मदद से इन खिलाड़ियों के प्रदर्शन को निखारना होगा। इसके साथ ही खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच भी प्रदान करना होगा।

 

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