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हरियाणा में दशकों पुराना है जाट आरक्षण का मुद्दा , हुकम सिंह सरकार में शुरू हुआ था विवाद

भजनलाल ने रद्द की थी गुरनाम सिंह आयोग की सिफारिशें , बंसीलाल व चौटाला सरकार ने भी आरक्षण बना था फुटबाल

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5 Dariya News (राजकुमार अग्रवाल)

कैथल , 26 May 2016

Last updated on: May 26, 2016, 00:00 IST

हरियाणा में जाट आरक्षण के संबंध में हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को जो फैसला दिया है उसे लेकर पिछले करीब दो माह से अटकलों का दौर चल रहा था। हाईकोर्ट के फैसले ने हरियाणा सरकार के फैसले तथा आरक्षण की समूची प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा दिया है।प्रदेश में जाट आरक्षण का मुद्दा दशकों पुराना है। हरियाणा में यह मुद्दा सबसे पहले मास्टर हुकम सिंह की सरकार में उठा था। उस समय की सरकार ने माननीय न्यायाधीश गुरनाम सिंह(सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता के अधीन 7 सितम्बर,1990 को इसका प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग स्थापित किया गया। आयोग ने 30 दिसम्बर, 1990 को अपनी रिपोर्ट पेश की और राज्य सरकार द्वारा आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर ली गई। राज्य सरकार द्वारा अपनी अधिसूचना संख्या 299-एसडब्ल्यू(1), दिनांक 5 फरवरी,1991 द्वारा 10 जातियों अर्थात् अहीर, बिश्नोई, मेव, गुज्जर, जाट, जट-सिख, रोड़, सैनी, त्यागी तथा राजपूत को पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल किया गया। 

राज्य सरकार द्वारा 5 अप्रैल, 1991 के अनुदेश द्वारा इन जातियों को आरक्षण उपलब्ध करवाया गया। राज्य सरकार द्वारा आरक्षण नीति का पुन:परीक्षण किया गया तथा 12 सितंबर, 1991 को आदेश जारी किया गया कि अंतिम निर्णय लिए जाने तक, दिनांक 5 अप्रैल, 1991 को जारी किए गए पत्र से पूर्व विद्यमान स्थिति के अनुसार भर्ती की जाएगी।इसके बाद प्रदेश में भजनलाल मुख्यमंत्री बन गए। भजनलाल सरकार के दौरान एक अक्तूबर, 1993 को भारत के उच्च न्यायालय में शपथ-पत्र भी प्रस्तुत किया गया कि हरियाणा सरकार द्वारा गुरनाम सिंह आयोग की सिफारिशों के अनुसरण में किए गए सभी आरक्षणों को रोक दिया गया है तथा कहा गया कि  जातियों को शामिल करने तथा निकालने हेतु विचार करने, परीक्षण करने के लिए एक  स्वतंत्र आयोग का गठन किया जा रहा है। 

भजनलाल सरकार द्वारा रामजी लाल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया, जो बाद में देशराज कंबोज से प्रतिस्थापित किया गया। इस आयोग की सिफारिशों पर राज्य सरकार 7 जून, 1995 द्वारा पिछड़े वर्ग की सूची में पांच जातियों अर्थात् अहीर/यादव, गुज्जर, सैनी, मेव, लोढ तथा लोढा को शामिल किया गया। आगे मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार द्वारा दिनांक 6 जून, 1995 को आयोजित मंत्री परिषद की बैठक के अनुमोदन के बाद दिनांक 20 जुलाई, 1995 को अनुदेश जारी किया गया जिसमें पिछड़े वर्गों को दो ब्लाकों 'एÓ तथा 'बीÓ में विभक्त किया गया था तथा राज्य के पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध करवाया गया। इसके अन्तर्गत 16 प्रतिशत आरक्षण उपरोक्त यथा संदर्भित ब्लॉक 'एÓ (67 जातियां) तथा 11 प्रतिशत ब्लॉक 'बीÓ (6 जातियां) को उपलब्ध करवाया गया था।

इसके बाद सत्ता संभालने वाले स्वर्गीय बंसीलाल तथा ओम प्रकाश चौटाला की सरकारों में भी आरक्षण का मामला राजनैतिक मुद्दा बना रहा। इसके बाद सत्ता में हुए भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 8 अप्रैल, 2011 द्वारा माननीय न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) के. सी. गुप्ता की अध्यक्षता में हरियाणा पिछड़ा वर्ग आयोग का पुर्नगठन किया गया। आयोग द्वारा 12 दिसम्बर, 2012 को  अपनी सिफारिशें सरकार को प्रस्तुत की गई। मंत्री परिषद द्वारा 12 दिसम्बर, 2012 को आयोजित बैठक में आयोग की सिफारिशें स्वीकृत कर ली गई। मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार द्वारा अपने अर्ध सरकारी पत्र दिनांक 14 दिसम्बर, 2012 द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची में शामिल करने के लिए मामला भारत सरकार को भेजा गया। हुड्डा सरकार द्वारा इस रिपोर्ट के आधार पर जाटों को विशेष ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण प्रदान कर दिया गया, लेकिन हुड्डा सरकार का यह फैसला पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। प्रदेश की मौजूदा खट्टर सरकार ने 29 मार्च को जाटों को आरक्षण प्रदान किए जाने का विधेयक पारित किया था। जिस पर आज फिर से अंतरिम रोक लग गई है।

 

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