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वो तो चले गए, ऐ दिल... जटिल सुरों को मधुर बनाने वाले उस्ताद थे सज्जाद हुसैन

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 14 Jun 2026

Last updated on: Jun 15, 2026, 13:14 IST

15 जून सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के लिए एक बेहद खास दिन है। इसी दिन वर्ष 1917 में जन्मे सज्जाद हुसैन ने अरबी संगीत की बारीकियों और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के स्वरों को अपनी धुनों में इस तरह पिरोया कि उन्होंने फिल्म संगीत को एक अलग पहचान दी। जटिल सुरों को मधुरता में ढालने की उनकी कला आज भी संगीत प्रेमियों को आकर्षित करती है और नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरणा देती है।

सज्जाद हुसैन उस दौर के संगीतकार थे जब हर धुन को साधना एक तपस्या जैसा काम था। उन्होंने संगीत को कभी आसान रास्ते से नहीं देखा। उनके लिए सुर सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि एक गहरी साधना थे। यही वजह थी कि उनकी रचनाएं अक्सर जटिल होती थीं, लेकिन उनमें एक ऐसी मिठास होती थी जो सुनने वाले को बांध लेती थी।

उनकी खासियत यह थी कि वे अरबी शैली के संगीत के टुकड़ों को भी अपने अंदाज में पिरो लेते थे और साथ ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की राग-रागनियों को भी बेहद सोच-समझकर इस्तेमाल करते थे। यह मिलन किसी साधारण प्रयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि उनकी गहरी समझ और वर्षों की साधना का हिस्सा था। उन्होंने संगीत को कभी सीमाओं में नहीं बांधा, बल्कि उसे खुला आसमान दिया।

उनकी रचनात्मकता का अंदाज इतना अलग था कि वे अपने समकालीन संगीतकारों से एक अलग ही राह पर चलते थे। जैसे हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह का अलग स्वर और शास्त्रीय संगीत में उस्ताद अमीर ख़ान का अपना रास्ता था, वैसे ही सज्जाद हुसैन भी अपनी ही धुनों की दुनिया बसाते थे। उनकी धुनें कभी आसान नहीं थीं, लेकिन जब समझ में आती थीं तो लंबे समय तक मन में गूंजती रहती थीं।

संगदिल, सैयां, हलचल, खेल और रुस्तम-ए-सोहराब जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी मिसाल माना जाता है। इन फिल्मों में उनके गीत सिर्फ़ गाने नहीं थे, बल्कि भावनाओं की गहराई को छूने वाले अनुभव थे। उनकी धुनों को गाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। लता मंगेशकर जैसी महान गायिका भी सज्जाद हुसैन को अपने करियर के सबसे खास संगीतकारों में गिनती थीं।

उन्होंने खुद कहा था कि सज्जाद साहब जैसा संगीत किसी और ने नहीं बनाया। ऐ दिलरुबा नजरें मिला और वो तो चले गए, ऐ दिल... जैसे गीत इसका उदाहरण हैं। सज्जाद हुसैन सिर्फ एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि एक प्रयोगशील कलाकार थे, जो हर वाद्य को समझते थे मैंडोलिन, गिटार, वायलिन, पियानो, क्लैरिनेट या एकॉर्डियन, हर चीज पर उनकी पकड़ थी।

उनकी धुनों में तान, मुरकी और मींड का ऐसा उपयोग होता था जो संगीत को एक नया आयाम देता था। उनका स्वभाव भी उतना ही अनोखा था जितना उनका संगीत। वे अपने काम के प्रति बेहद गंभीर और कई बार सख्त भी माने जाते थे। कहा जाता है कि वे बहुत कम गायकों को अपने संगीत के लिए उपयुक्त मानते थे, लेकिन यही सख्ती उनकी कला की शुद्धता को बनाए रखती थी। 1944 की फिल्म 'दोस्त' में नूरजहां के साथ उनका काम और 'बदनाम मोहब्बत कौन करे' जैसा गीत आज भी सुनने वालों के दिल में जिंदा है।

 

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