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गोपाल कृष्ण गोखले : आधुनिक भारत के विचारक और गांधीजी के राजनीतिक गुरु

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Armaan

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नई दिल्ली , 08 May 2026

Last updated on: May 08, 2026, 16:02 IST

9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक छोटे से गांव कोटलुक में जन्मे गोखले का बचपन भीषण गरीबी और आर्थिक संकटों में बीता। चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस लड़के के लिए शिक्षा एक ऐसा हथियार थी, जिससे वे अपनी और देश की किस्मत बदल सकते थे। वे उस पीढ़ी के पहले कुछ भारतीयों में से थे, जिन्होंने औपनिवेशिक काल में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा के तहत स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की थी।

​महज 20 साल की उम्र में यह प्रतिभावान युवा पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में इतिहास और अर्थशास्त्र का प्रोफेसर बन गया। यहीं जॉन स्टुअर्ट मिल और एडमंड बर्क के उदारवादी विचारों ने उनके मन में भारत के स्व-शासन का बीज बोया। ​गोपाल कृष्ण गोखले का असली राजनीतिक सफर तब परवान चढ़ा जब वे महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे के संपर्क में आए।

रानाडे ने इस युवा प्रोफेसर को आंकड़ों, नीली किताबों और नीतियों का ऐसा कुशल विश्लेषक बना दिया कि ब्रिटिश हुक्मरान भी उनसे खौफ खाने लगे। ​अंतरराष्ट्रीय पटल पर उनकी चमक तब बिखरी जब 1897 में 31 साल के गोपाल कृष्ण गोखले लंदन के 'वेल्बी आयोग' के सामने गवाही देने पहुंचे। वहां उन्होंने सप्रमाण साबित कर दिया कि कैसे ब्रिटिश नीतियां भारत का खून चूस रही हैं।

उन्होंने अंग्रेजों के मुंह पर बेबाकी से कहा कि उनकी 'मुक्त व्यापार' नीति ने भारत के स्वदेशी उद्योगों को तबाह कर दिया है और किसानों को भुखमरी की कगार पर ला खड़ा किया है। ​इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में उनके बजट भाषण कोई आम राजनीतिक बयानबाजी नहीं होते थे, बल्कि वे अकादमिक शोध होते थे। वे नमक कर और सूती वस्त्रों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क के सख्त खिलाफ थे, क्योंकि वे जानते थे कि इसका सीधा असर गरीब भारतीय की थाली पर पड़ता है।

​गोपाल कृष्ण गोखले का दृढ़ विश्वास था कि एक अनपढ़ देश कभी अपने हक के लिए नहीं लड़ सकता। 1911 में उन्होंने काउंसिल में पूरे भारत के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का एक ऐतिहासिक बिल पेश किया। वे जानते थे कि ब्रिटिश नौकरशाही इसे पास नहीं होने देगी। ​मार्च 1912 में बिल गिर गया लेकिन गोखले निराश नहीं हुए।

उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी इस हार को एक "वीरतापूर्ण हार" का नाम दिया। उन्हें पता था कि आज काउंसिल में हारी गई यह बाजी, कल की पीढ़ियों के लिए शिक्षा के बंद दरवाजे खोल देगी। ​कांग्रेस के मंचों पर भाषण देने से परे गोपाल कृष्ण गोखले जमीनी हकीकत से जुड़े इंसान थे। 1905 में उन्होंने 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की।

यह कोई राजनीतिक दल नहीं था बल्कि ऐसे "राष्ट्रीय मिशनरियों" को तैयार करने की एक भट्ठी थी, जो अपना पूरा जीवन देश के लिए झोंक दें। ​इस संस्था के सदस्यों का लक्ष्य सिर्फ राजनीति नहीं था बल्कि अछूतोद्धार, बाल श्रम का खात्मा, महिलाओं की शिक्षा और अकाल या महामारियों के दौरान लोगों की सेवा करना था। गोखले ने पहली बार भारत को सिखाया कि सच्ची देशभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े लोगों के आंसू पोंछने में है।

​लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गोखले दोनों ही महान देशभक्त थे, लेकिन उनके रास्ते बिल्कुल अलग थे। जहां तिलक तुरंत 'स्वराज' और आक्रामक बहिष्कार चाहते थे, वहीं गोखले शांतिपूर्ण, संवैधानिक और क्रमिक सुधारों के पक्षधर थे। इसी वैचारिक मतभेद के कारण 1907 का ऐतिहासिक सूरत विभाजन हुआ। ​गोपाल कृष्ण गोखले ने भारतीय राजनीति को जो सबसे बड़ा दर्शन दिया, वह "राजनीति का आध्यात्मीकरण" था।

उन्होंने गांधी जी को सिखाया कि केवल लक्ष्य (स्वराज) पवित्र होना काफी नहीं है, बल्कि उसे पाने का साधन (रास्ता) भी पूरी तरह से नैतिक और अहिंसक होना चाहिए। गोपाल कृषण गोखले के इसी दर्शन को गांधी जी ने अपने 'सत्याग्रह' का आधार बनाया। गोपाल कृ्ष्ण गोखले के लगातार आग्रह के कारण ही 1915 में गांधीजी हमेशा के लिए दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए थे।

​अपनी मृत्यु से ठीक पहले 1915 में उन्होंने एक "राजनीतिक वसीयतनामा" तैयार किया, जिसमें उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण और प्रांतीय स्वायत्तता का सपना देखा था। आज हमारे देश में जो पंचायती राज की व्यवस्था है, उसमें गोखले की इसी दूरदृष्टि की झलक मिलती है। ​19 फरवरी 1915 को आधुनिक भारत के इस शिल्पी का निधन हो गया।

 

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