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मेरे अंदर की अबोध लड़की... स्त्री विमर्श की शुरुआती मुखर आवाज स्नेहमयी चौधरी

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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

5 Dariya News

नई दिल्ली , 08 May 2026

Last updated on: May 08, 2026, 13:48 IST

"मेरे अंदर की अबोध लड़की..." स्नेहमयी चौधरी की ये पंक्तियां सिर्फ एक कविता का हिस्सा नहीं हैं बल्कि जीवन की उन परतों को खोलती हैं जिन्हें अक्सर हम रोजमर्रा की भागदौड़ में महसूस तो करते हैं, लेकिन शब्द नहीं दे पाते। उनकी कविताएं पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई बहुत साधारण-सी दिखने वाली बात अचानक हमारे भीतर गहरे उतर गई हो।

यही उनकी कविता की सबसे बड़ी खूबी है। वे बड़ी-बड़ी बातों को बिना किसी भारी भाषा या जटिल प्रतीकों के, बहुत सहज तरीके से कह देती थीं। स्नेहमयी चौधरी का जन्म 9 मई 1935 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मौरावां में हुआ था। गांव की मिट्टी, वहां का सामाजिक माहौल और जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियां शायद उनके भीतर बहुत गहराई से बसी रहीं।

आगे चलकर उनका विवाह प्रसिद्ध साहित्यकार अजित कुमार से हुआ। यह एक ऐसा साहित्यिक परिवार था जहां लेखन और विचारों का माहौल पहले से मौजूद था। अजित कुमार लोकप्रिय कवयित्री सुमित्रा कुमारी सिन्हा के पुत्र थे और चर्चित कवयित्री कीर्ति चौधरी उनके परिवार से जुड़ी थीं। ऐसे वातावरण ने स्नेहमयी चौधरी की रचनात्मकता को और गहराई दी।

हालांकि, यह कहना गलत होगा कि वे सिर्फ साहित्यिक माहौल की वजह से कवयित्री बनीं। उनकी अपनी दृष्टि थी, अपना अनुभव संसार था। वे जीवन को बहुत करीब से देखती थीं। उनकी कविताओं में घर-परिवार, रिश्ते, अकेलापन, स्त्री की चुप्पी, उसके भीतर का संघर्ष और समय के साथ बदलते रिश्तों की पीड़ा बार-बार दिखाई देती है।

खास बात यह है कि वे इन विषयों पर किसी नारों वाली भाषा में नहीं लिखतीं बल्कि बहुत आत्मीय ढंग से बात करती हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में हिंदी भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका भी रहीं। अध्यापन और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में उनका गहरा जुड़ाव था। शायद इसी कारण उनकी भाषा में एक संतुलन दिखाई देता है।

उनकी कविताएं बौद्धिक भी हैं और भावनात्मक भी। वे पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं लेकिन बोझिल नहीं लगतीं। स्नेहमयी चौधरी की कविताओं में स्त्री विमर्श की एक शुरुआती लेकिन मजबूत आहट मिलती है। वे उस दौर में लिख रही थीं जब स्त्रियों की समस्याओं पर खुलकर बात करना इतना सामान्य नहीं था। उन्होंने स्त्री के भीतर के दुख, घुटन और अकेलेपन को बहुत सच्चाई से सामने रखा।

उनकी कविताओं में प्रतिरोध है लेकिन वह शोर मचाने वाला प्रतिरोध नहीं है। वह भीतर से उठने वाली बेचैनी है, जो पाठक को धीरे-धीरे प्रभावित करती है। उनकी कविता में सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है उसकी सादगी। वे किसी बनावटी भाषा का इस्तेमाल नहीं करतीं। ऐसा लगता है जैसे घर के किसी कोने में बैठी कोई स्त्री अपने मन की बात धीरे-धीरे कह रही हो।

हालांकि वही धीमी आवाज बहुत देर तक हमारे भीतर बनी रहती है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में एकाकी दोनों, पूरा गलत पाठ, हड़कंप, अपने खिलाफ और चौतरफा लड़ाई शामिल हैं। इन संग्रहों के नाम ही उनके लेखन की दिशा का संकेत देते हैं। अकेलापन, संघर्ष, भीतर की टूटन और जीवन से लगातार जूझते रहने का भाव उनकी कविताओं में बार-बार लौटता है।

उन्हें रचना पुरस्कार (कलकत्ता) और हिंदी अकादमी पुरस्कार (दिल्ली) जैसे कई सम्मानों से सम्मानित किया गया। वहीं, उनका सबसे बड़ा सम्मान उनके पाठक हैं, जो आज भी उनकी कविताओं में अपने जीवन का कोई हिस्सा खोज लेते हैं। 29 जुलाई 2017 को उनका निधन हो गया। इससे कुछ ही दिन पहले अजित कुमार का भी निधन हुआ था।

 

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