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बृहस्पति का चंद्रमा यूरोपा : पृथ्वी से दोगुना पानी, जानें क्यों खास है यह चंद्रमा

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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

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नई दिल्ली , 04 May 2026

Last updated on: May 04, 2026, 13:47 IST

हमारे सौर मंडल में पृथ्वी के अलावा जीवन की संभावना वाले स्थानों की खोज में वैज्ञानिकों का ध्यान बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा पर सबसे ज्यादा है। यूरोपा पर पृथ्वी से दोगुना से भी ज्यादा पानी होने का अनुमान है, हालांकि इसकी सतह इतनी ठंडी है कि सारा पानी बर्फ बनकर जम गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बर्फीली परत के नीचे तरल महासागर हो सकता है, जहां जीवन के संकेत मिल सकते हैं। यूरोपा बृहस्पति का सबसे छोटा चंद्रमा है।

यह पृथ्वी के चंद्रमा से थोड़ा ही छोटा है, लेकिन बहुत ज्यादा ठंडा है। कारण है इसकी दूरी। यूरोपा सूर्य से पृथ्वी की दूरी से पांच गुना ज्यादा दूर है। यहां सूर्य की रोशनी और गर्मी बहुत कम पहुंचती है, जिससे सतह का तापमान बेहद कम रहता है। सतह पर मौजूद पानी पत्थर जैसी सख्त बर्फ बन चुका है। वैज्ञानिक कहते हैं कि यहां बर्फ तोड़ने के लिए सामान्य आइस पिक नहीं, बल्कि जैकहैमर की जरूरत पड़ेगी।

यूरोपा में पानी की भरपूर संभावना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यूरोपा में पृथ्वी से दोगुना से भी ज्यादा पानी है। लेकिन सारा पानी सतह पर नहीं, बल्कि मोटी बर्फ की परत के नीचे तरल रूप में छिपा हो सकता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के गैलीलियो मिशन ने इसके पक्के सबूत दिए हैं कि बर्फ की मोटी परत के नीचे विशाल खारा महासागर मौजूद है।

पृथ्वी पर भी कुछ जीव बिना सूर्य की रोशनी वाले अंधेरे और कठोर वातावरण में रह सकते हैं, इसलिए यूरोपा पर भी सूक्ष्म जीवन की संभावना जताई जा रही है। यूरोपा पर सतह भले ही जमी हुई हो, लेकिन अंदरूनी भाग गर्म रहता है। इसका मुख्य कारण है बृहस्पति का बेहद मजबूत गुरुत्वाकर्षण। यूरोपा बृहस्पति की परिक्रमा करते समय गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव से लगातार खिंचता रहता है।

इस खिंचाव से अंदर रगड़ पैदा होती है, जो गर्मी उत्पन्न करती है। इस गर्मी के कारण बर्फ के नीचे का पानी तरल रूप में बना रहता है। इसके अलावा, बृहस्पति के अन्य चंद्रमा आयो और गेनीमेड भी यूरोपा को गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित करते हैं। इन खिंचावों के कारण यूरोपा की कक्षा गोलाकार नहीं रहती और लगातार बदलती रहती है।

इसी प्रक्रिया को ज्वार-भाटा कहते हैं, जो यूरोपा को पूरी तरह जमने नहीं देता। इन सारी संभावनाओं को जांचने के लिए नासा ‘यूरोपा क्लिपर’ नामक अंतरिक्ष यान साल 2024 में लॉन्च कर चुका है। यह मिशन यूरोपा की सतह, बर्फ की परत और नीचे छिपे महासागर का विस्तृत अध्ययन करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या यूरोपा पर जीवन के लिए जरूरी शर्तें मौजूद हैं या नहीं।

यूरोपा अध्ययन न सिर्फ सौर मंडल की समझ बढ़ाएगा बल्कि यह भी बताएगा कि पृथ्वी के अलावा दूसरे चंद्रमाओं या ग्रहों पर जीवन कैसे संभव हो सकता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस बर्फीले चंद्रमा के नीचे छिपा महासागर ब्रह्मांड में जीवन की खोज में नई दिशा दे सकता है।

 

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