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दामोदर हरि चापेकर : पुणे से उठी थी भारत की पहले सशस्त्र क्रांति की लौ, भाई भी हुए देश के लिए कुर्बान

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Armaan

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नई दिल्ली , 17 Apr 2026

Last updated on: Apr 17, 2026, 13:51 IST

भारत की आजादी की लड़ाई में सशस्त्र क्रांति की शुरुआत करने वाले दामोदर हरि चापेकर को 18 अप्रैल 1898 अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। दामोदर, चापेकर बंधुओं में सबसे ज्येष्ठ भाई थे, जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचार के खिलाफ पहला बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। 18 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि है। दामोदर हरि चापेकर का जन्म 25 जून 1869 को महाराष्ट्र के पुणे के निकट चिंचवड़ गांव में हुआ था।

पिता हरिपंत चापेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे, जिनसे उन्हें सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत मिली। दो छोटे भाई बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर भी स्वतंत्रता संग्राम में दामोदर के साथ खड़े हुए थे। तीनों भाइयों को सम्मिलित रूप से चापेकर बंधु कहा जाता है। दामोदर बचपन से ही सैनिक बनना चाहते थे, जिसके लिए व्यायाम और सैन्य प्रशिक्षण में रुचि लेते थे।

परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण कीर्तन और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लिया। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे। तिलक के केसरी समाचार-पत्र और उनके राष्ट्रवादी विचारों ने दामोदर को गहराई से प्रभावित किया। 1896 के अंत में पुणे में ब्युबोनिक प्लेग फैला और 1897 की फरवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया।

तब तक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को 40 साल हो चुके थे और ब्रिटिश ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था। मुंबई (बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को रोकथाम के लिए नियुक्त किया गया। रैंड के प्लेग नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूंढते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते।

वॉल्टर चार्ल्स रैंड के निर्देश पर सैनिक घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जांच करते। इन अत्याचारों ने पुणे की जनता को आक्रोशित कर दिया। तिलक और अन्य नेताओं ने भी रैंड की नीतियों की कड़ी आलोचना की, जिसके कारण तिलक को जेल हुई। दामोदर और उनके भाइयों ने इस अत्याचार को चुपचाप सहन नहीं किया।

उन्होंने रैंड की हत्या का फैसला किया, ताकि ब्रिटिश शासन को संदेश दिया जा सके कि भारतीय अब गुलामी सहन नहीं करेंगे। 22 जून 1897 को रानी विक्टोरिया के डायमंड जयंती समारोह के बाद रैंड सरकारी भवन (गवर्नमेंट हाउस) से लौट रहा था। इस दिन दामोदर ने अपने भाई बालकृष्ण के साथ मिलकर रैंड की हत्या की योजना बनाई थी और तलवार और बंदूक लेकर हमला करने निकल गए।

गणेशखिंड रोड (वर्तमान सेनापति बापट रोड) पर दामोदर और बालकृष्ण रैंड का इंतजार करने लगे। जैसे ही दामोदर की सवारी आई, दामोदर ने रैंड की गाड़ी के पास पहुंचकर गोली चला दी। रैंड के ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वॉल्टर का फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सिर में गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर मौत हो गई।

हालांकि वॉल्टर की मौत तुरंत नहीं हुई, उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां 3 जुलाई 1897 को मौत हो गई। यह घटना भारत की स्वतंत्रता संग्राम में पहला सशस्त्र क्रांतिकारी हमला माना जाता है। इससे ब्रिटिश सरकार में खलबली मच गई। दामोदर ने पूरे जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और अदालत में निर्भीक बयान दिया। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी।

उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को पुणे में फांसी दी गई। फांसी से पहले उन्होंने बाल गंगाधर तिलक से गीता की प्रति मांगी थी। फांसी के समय भी उनके हाथ में गीता थी। सबसे छोटे भाई वासुदेव ने गद्दारों की हत्या कर बदला लिया, लेकिन उन्हें भी 8 मई 1899 को फांसी दी गई। जबकि भाई बालकृष्ण को 12 मई 1899 को फांसी दी गई।

दामोदर चापेकर ने फांसी से पहले अपना आत्मवृत्त लिखा था, जिसमें उन्होंने क्रांति के पीछे के कारणों और ब्रिटिश अत्याचारों का विस्तार से वर्णन किया है। यह आत्मवृत्त क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना। चापेकर बंधुओं का बलिदान भारत की क्रांतिकारी परंपरा की नींव रखने वाला था। विनायक दामोदर सावरकर जैसे युवा क्रांतिकारी इससे प्रेरित हुए। लाला लाजपत राय ने भी उनकी प्रशंसा की। पुणे में आज भी उनके सम्मान में प्रतिमा स्थापित है, जो उनकी याद दिलाती है।

 

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