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बिरसा मुंडा सामाजिक न्याय की खोज में राष्ट्र का मार्गदर्शन करते रहेंगे : सी.पी. राधाकृष्णन

CP Radhakrishnan, Chandrapuram Ponnusami Radhakrishnan, Vice President of India, BJP, Bharatiya Janata Party, Birsa Munda, New Delhi
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Armaan

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नई दिल्ली , 09 Jun 2026

Last updated on: Jun 09, 2026, 16:52 IST

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने मंगलवार को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक बिरसा मुंडा को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। बिरसा मुंडा को भारत के सबसे प्रमुख आदिवासी नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों में से एक माना जाता है।

1875 में आज के झारखंड में जन्मे बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और आदिवासी समुदायों पर थोपी गई शोषणकारी जमीन नीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक 'उलगुलान' या 'महान विद्रोह' का नेतृत्व किया। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एक्स पोस्ट में लिखा, "भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर मैं सम्मानित 'धरती आबा' को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, जिनका जीवन साहस, आत्म-सम्मान और न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था।

ऐतिहासिक 'उलगुलान' के माध्यम से उन्होंने दमन के खिलाफ प्रतिरोध की भावना जगाई और आदिवासी समुदायों को अपने अधिकारों, पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरित किया।" उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा, "यह मेरे लिए गहरे व्यक्तिगत सम्मान की बात है कि मुझे झारखंड के राज्यपाल के रूप में पदभार संभालने के पहले ही दिन और हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में उनके पवित्र जन्मस्थान 'उलिहातू' पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर मिला।"

उल्लेखनीय है कि अपने आंदोलन के जरिए बिरसा मुंडा ने हजारों आदिवासी लोगों को उनके अधिकारों, पहचान और पारंपरिक जमीन के मालिकाना हक के लिए लड़ने के लिए एकजुट किया। हालांकि उनका आंदोलन मुख्य रूप से छोटानागपुर क्षेत्र तक ही सीमित था, लेकिन बिरसा मुंडा की विरासत असम सहित कई राज्यों में भी काफी असरदार है।

असम में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी और 'टी ट्राइब' (चाय बागान में काम करने वाले आदिवासी समुदाय) के लोग रहते हैं, जिनके पूर्वज औपनिवेशिक काल के दौरान छोटानागपुर पठार से वहां जाकर बस गए थे। असम के चाय बागान समुदाय के कई लोगों की जड़ें उन इलाकों से जुड़ी हैं, जहां बिरसा मुंडा ने संघर्ष किया था और वे आज भी उन्हें प्रतिरोध, सम्मान और सशक्तिकरण का प्रतीक मानते हैं।

हाल के वर्षों में आदिवासी अधिकारों के लिए उनके योगदान को काफ़ी पहचान मिली है। केंद्र सरकार ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का सम्मान करने और भारत की समृद्ध आदिवासी विरासत का जश्न मनाने के लिए बिरसा मुंडा की जयंती यानी 15 नवंबर को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में घोषित किया है।

असम भर के राजनीतिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और आदिवासी समूहों ने भी इस महान नेता को श्रद्धांजलि दी और मूल निवासी तथा हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों की लड़ाई में उनकी भूमिका को याद किया। 9 जून 1900 को 25 साल की उम्र में ब्रिटिश हिरासत में बिरसा मुंडा का निधन हो गया था, लेकिन उनकी विरासत आज भी देश भर की पीढ़ियों को प्रेरित करती है।

 

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