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भरतनाट्यम की 'क्वीन' टी. बालासरस्वती, देवदासी परंपरा से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक चमकीं

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Armaan

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 12 May 2026

Last updated on: May 12, 2026, 16:48 IST

13 मई, सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि भारतीय शास्त्रीय कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाली शख्सियत को याद करने का दिन है। हम बात कर रहे हैं टी. बालासरस्वती की, जिसने भरतनाट्यम को मंदिरों की सीमाओं से निकालकर दुनिया के बड़े-बड़े मंचों तक पहुंचाया। वह सिर्फ एक नृत्यांगना नहीं, बल्कि परंपरा, संघर्ष, कला और आत्मविश्वास का एक उदाहरण थीं।

टी. बालासरस्वती का जन्म 13 मई 1918 को तमिलनाडु के चेन्नई (मद्रास) शहर में हुआ था। उनके परिवार की जड़ें देवदासी परंपरा और संगीत से गहराई से जुड़ी थीं। उनकी दादी वीणा धन्नमल एक मशहूर वीणा वादक थीं और उनकी मां टी. जयम्मल खुद एक गायिका थीं। घर के माहौल का असर उनपर भी पड़ा, जिस वजह से उन्होंने बहुत कम उम्र में ही भरतनाट्यम का प्रशिक्षण शुरू कर दिया था और मात्र सात साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन मंदिर में किया था।

वह सिर्फ नृत्य नहीं करती थीं, बल्कि उसे जीती थीं। उनके अभिनय में भावनाओं की गहराई होती थी। वह बखूबी इशारे और चेहरे के भाव से पूरी कहानी कह देती थीं। उनके नृत्य में संगीत, लय और भाव का ऐसा मेल होता था, जिसे देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध रह जाता था। उस दौर में भरतनाट्यम धीरे-धीरे संस्थागत रूप ले रहा था और ज्यादातर कलाकार पहले से तय कोरियोग्राफी पर प्रस्तुति देते थे, लेकिन बालासरस्वती अलग थीं।

वह मंच पर अपने अभिनय में तात्कालिकता लाती थीं, ठीक वैसे ही जैसे पुरानी दरबारी नर्तकियां करती थीं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत और खासियत थी। उनकी कला की चर्चा धीरे-धीरे पूरे देश में फैलने लगी। मशहूर नर्तक उदय शंकर भी उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें कोलकाता में एक बड़े सम्मेलन में प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया।

वहां उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के सामने जन गण मन पर प्रस्तुति दी, जिसने उनकी पहचान को और ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। इसके बाद उनका सफर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा। 1960 के दशक में उन्होंने जापान, अमेरिका और यूरोप में भरतनाट्यम का प्रदर्शन किया। टोक्यो में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उनकी प्रस्तुति ने पश्चिमी दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गहराई से परिचित कराया।

उनकी कला पर सिर्फ दर्शक ही नहीं, बल्कि बड़े कलाकार और फिल्मकार भी फिदा थे। मशहूर फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने 1970 के दशक में उन पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें उनकी कला और जीवन दोनों को बहुत सुंदर तरीके से दिखाया गया। टी. बालासरस्वती को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले।

उन्हें पद्म भूषण और बाद में पद्म विभूषण जैसे भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले। टी. बालासरस्वती ने 9 फरवरी 1984 को 65 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके प्रशंसक आज भी उन्हें प्रेरणा मानते हैं।

 

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