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यंत्र की चमक बताएगी शरीर में निकोटिन की मात्रा : राजेश चंद्र बाली

Rajesh Chander Bali
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5 Dariya News

चंडीगढ़ , 23 Apr 2026

Last updated on: Apr 24, 2026, 13:02 IST

भारत सरकार के नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (इंस्ट), मोहाली ने एक नई सामग्री विकसित की है जो फ्लोरोमेट्रिक सेंसिंग के माध्यम से मानव शरीर में निकोटिन और कोटिनिन की मात्रा का पता लगा सकती है। फ्लोरोमेट्रिक सेंसिंग एक ऐसी तकनीक है जो फ्लोरोसेंट उत्सर्जन का उपयोग करके विभिन्न मापदंडों को मापती है।

वर्तमान मामले में, यह सामग्री, जो एक सेंसर के रूप में कार्य करती है, निकोटीन या कोटीनिन के संपर्क में आने पर तेजी से चमकने लगती है, जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में तंबाकू के संपर्क का शीघ्र पता लगाने और समय पर कार्रवाई करने में यह उपयोगी सिद्ध हो सकती है। आमतौर पर इस सामग्री की चमक बहुत कम होती है, लेकिन जब यह सेंसर इन हानिकारक रसायनों के संपर्क में आता है, तो इसकी चमक अत्यधिक तीव्र हो जाती है। 

इससे अनुसंधान मौजूदा तरीकों की तुलना में काफी आसान और त्वरित हो जाता है। नई तकनीक से, छोटी से छोटी मात्रा की भी तेजी और सटीकता से पहचान की जा सकती है, जो स्वास्थ्य सेवाओं और अनुसंधान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

यह सामग्री एक लौह-आधारित धातु-जैविक फ्रेमवर्क (एफई-एमओएफ) है, जिसका सामान्य अर्थ है कि यह लोहे और जैविक अणुओं से बनी एक बहुत ही सूक्ष्म संरचना है। यह संरचना मानव बाल से हजारों गुना छोटी होती है और इसमें बहुत छोटे छिद्र होते हैं जो अन्य अणुओं को फंसाने और उनके साथ क्रिया करने की क्षमता रखते हैं।

आईएनएसटी (इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी) की वैज्ञानिक मोनिका सिंह ने अपनी शोध छात्रा अर्शमिंदर कौर के साथ मिलकर इस तकनीक को विकसित किया है। उन्होंने कहा कि यह अभी इन विट्रो चरण में है, लेकिन जैविक प्रणालियों में उपयोग के लिए सुरक्षित पाया गया है। 

प्रयोगों में यह साबित हुआ कि यह जैव-अनुकूल है, जिसका अर्थ है कि यह जीवित कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचाता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि इससे कोशिका स्तर पर वास्तविक समय की निगरानी संभव हो पाती है। उन्होंने कहा कि लंबे समय में, इस तकनीक का उपयोग रक्त के नमूनों के माध्यम से शरीर में निकोटीन और कोटिनिन की प्रतिशत मात्रा का पता लगाने के लिए भी किया जा सकेगा।

इस मैटीरियल का एक और महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह पानी में और विभिन्न परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से कार्य करता है। यह शरीर में मौजूद अन्य सामान्य पदार्थों से प्रभावित नहीं होता है, जिससे यह सटीक परिणाम देता है। अनेक बार उपयोग करने के बाद भी यह मैटीरियल प्रभावी तरीके से काम करता रहता है, जिससे यह पुन: प्रयोज्य और लागत-प्रभावी बन जाता है।

यह शोध विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार इस तरह की सामग्री का उपयोग कोटिनिन की व्यापक फ्लोरोसेंस के माध्यम से पहचान के लिए किया गया है। यह साधारण परीक्षण किटों के विकास के लिए नई संभावनाएँ खोलता है, जो धूम्रपान करने वालों के लिए और दूसरे हाथ के धुएँ के संपर्क की निगरानी के लिए लाभदायक हो सकती हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों को तंबाकू के संपर्क का तेजी से पता लगाने तथा समय पर कार्रवाई करने में मदद करेगी। यह जन स्वास्थ्य अभियानों को भी समर्थन दे सकती है क्योंकि यह आसान और किफ़ायती परीक्षण विधियाँ प्रदान कर सकती है। 

कुल मिलाकर, यह नवीनतम सामग्री बेहतर स्वास्थ्य निगरानी और धूम्रपान-मुक्त समाज की ओर एक आशाजनक कदम है, क्योंकि हर साल दुनिया भर में लाखों लोग तंबाकू जनित बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

 

 

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