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महिलाओं को हक़ दिलाने में न्यायपालिका की भूमिका : हिमांशु देशवाल

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 09 Mar 2021

महिला दिवस अगर सही मायनों में बनाना है तो भारत देश को ज़रूरत है कि यह भारत की महिलाओं को सही रूप में सशक्त करें।उनके हकों को लागू करें।महिलाओं के हकों को स्वीकार भी करें और स्वीकार भी कराएं ,तभी भारत देश में महिलाओं का सच्चा सम्मान होगा।

सार्थक रूप से महिला दिवस पर हमें महिलाओं के इन अधिकारों के प्रति ग़ौर फ़रमाना चाहिए और प्रयास करने चाहिए कि जल्द से जल्द इनको लागू किया जाए:-

1)पैतृक संपत्ति में बेटियों ,बहनों का हक़।

2)50% सांसद और असेंबली में महिलाओं का प्रतिनिधित्व।

3)रेप के ख़िलाफ़ डेथ पेनल्टी।

4)घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ कठोर सजा व पीड़ित महिलाओं के लिए सरकार की तरफ़ से आर्थिक सहायता।

पिछले दो-तीन बरसों में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे अहम फैसले दिए हैं, जिनसे महिलाओं को ज्यादा अधिकार मिले हैं। ये अधिकार उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर ज्यादा मजबूत बनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे फैसलों से महिलाएं न सिर्फ मायके में बल्कि ससुराल में भी ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रही हैं। ये फैसले कौन-से हैं और महिलाएं इनका इस्तेमाल कैसे कर सकती हैं।   

पिता की जायदाद में बेटी को भी हक

11 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर का अधिकार है और हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के वक्त चाहे बेटी के पिता जिंदा रहे हों या नहीं, बेटी को हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) में बेटे के बराबर संपत्ति में अधिकार मिलेगा।

- बेटी को पैदा होते ही जीवनभर बेटे के बराबर का अधिकार मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 की धारा-6 के तहत प्रावधान है कि बेटी पैदा होते ही कोपार्सनर (सह-वारिस) हो जाती है।

-हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के बाद बेटी पैदा हुई हो या पहले पैदा हुई हो, उसका हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) की संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संशोधन अधिनियम के तहत बेटी संपत्ति में अधिकार पाने की हकदार है चाहे पहले पैदा हुई हो या फिर बाद में।

- चूंकि कोपार्सनर (हम वारिस या सहदायिकी) का अधिकार जन्म से है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि कानून के संशोधन के वक्त यानी 9 सितंबर 2005 को बेटी के पिता अनिवार्य रूप से जिंदा ही रहे हों।

-सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 बेटे और बेटी को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है। यह कानून लागू होने से पहले के मामले में भी लागू होगा।

फैसले का असर

भारतीय सामाजिक स्थिति को देखते हुए यह फैसला बेहद अहम है। इससे महिलाएं और मजबूत होंगी।

- बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देना बेहद अहम है। दरअसल, ससुराल में जब लड़की, बहू के तौर पर जाती है तो वहां उसे पति की पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं होता बल्कि पति की हैसियत के हिसाब से उसे विवाद की स्थिति में गुजारा भत्ता दिया जाता है।

- मायके में बेटे के बराबर संपत्ति में अधिकार दिया गया है तो महिलाएं सुरक्षित महसूस करेंगी।

- पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने के बाद भी अभी तक भारतीय समाज की जो स्थिति है और जिस तरह से परंपरागत सोच हावी है, उससे न तो लड़की खुद और न ही उसके भाई व पिता संपत्ति देने के लिए पहल करते हैं। ऐसी स्थिति में यह फैसला दूरगामी असर रखता है।

-समाज में महिलाओं को खुद आगे आना होगा और अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी। तभी उन्हें पैतृक संपत्ति में बराबरी मिलेगी।

ऐसे पाएं इंसाफ

- संपत्ति जिस इलाके में है, उस इलाके की सिविल कोर्ट में बेटी संपत्ति की हिस्सेदारी के लिए अर्जी दाखिल कर सकती है। अगर संपत्ति का बंटवारा हो चुका है और बेटी को हिस्सा नहीं मिला है और उसे संपत्ति में हिस्सा चाहिए तो वह हिस्सेदारी के लिए अर्जी दे सकती है।

- उस संपत्ति में बाकी हिस्सेदारों ने जो लाभ कमाया है, उसमें भी वह हिस्सा मांग सकती है।

- इसके लिए लड़की को वकील की सहायता लेनी होती है और वकील की सहायता से वह न सिर्फ हिस्सेदारी मांग सकती है बल्कि संपत्ति का अगर बंटवारा नहीं हुआ है तो बंटवारे के लिए भी कह सकती है।

 इसके लिए 3 साल की अवधि तय की गई है यानी लड़की को जिस दिन इस बात का भान हुआ है उससे 3 साल के भीतर वह केस दायर कर सकती है।

बहू को ससुराल में रहने का मिला अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2020 को एक अहम फैसला दिया जिसमें बहू को ससुराल में रहने का अधिकार दिया गया है। दरअसल, डोमेस्टिक वॉयलेंस (डीवी) ऐक्ट के तहत दिए गए प्रावधान की सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की और कहा कि बहू अगर घर में रह चुकी है या रह रही है तो उसे वहां डीवी ऐक्ट के तहत रहने का अधिकार है।

- सास-ससुर अगर डोमेस्टिक रिलेशनशिप में हैं तो बहू साझे मकान में रह सकती है।

- सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ससुर की अर्जी खारिज कर दी जिसमें हाई कोर्ट ने कहा है कि बहू को उसके ससुराल के घर में उस सूरत में रहने का अधिकार है जब वह इस बात को साबित करती है कि वह डोमेस्टिक वॉयलेंस का शिकार हुई है और संपत्ति के मालिक के साथ वह डोमेस्टिक रिलेशनशिप में है।

- 2007 के दो जजों के फैसले को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शेयर्ड हाउसहोल्ड को परिभाषित करते हुए कहा कि इसका मतलब पति के रिश्तेदार से है जिसके साथ महिला डोमेस्टिक रिलेशनशिप में रह चुकी है।

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीवी ऐक्ट के तहत महिला पति के रिश्तेदारों (ससुरालवालों) के घर में रहने की मांग कर सकती है, जहां वह डोमेस्टिक रिलेशनशिप में रह चुकी है।

- दरअसल घरेलू हिंसा का शिकार होने पर सबसे पहले महिलाओं को अपने ससुराल से बेदखल होने का खतरा हो जाता है, लेकिन डीवी ऐक्ट की व्याख्या करते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उसके बाद महिलाएं अपने हक के लिए ससुराल में रहकर आवाज उठा सकती हैं और खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी।

ऐसे पाएं इंसाफ

- महिला को ससुराल में रहकर लड़ने का अधिकार है और उसे शेयर्ड हाउस होल्ड में रहने का अधिकार है। इसके लिए डीवी ऐक्ट के तहत प्रावधान है।

- महिला अपने ससुराल या मायके के इलाके के मैजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर कर डीवी ऐक्ट के तहत रहने का अधिकार मांग सकती है।

- किस इलाके का कौन-सा कोर्ट है उसका ब्यौरा www.delhicourts.nic.in पर है। यह दिल्ली के लिए है इसी तरह से देशभर की अदालतों का ब्यौरा ऑनलाइन उपलब्ध है। ऐसे वेबसाइट्स की लिस्ट इंटरनेट पर आसानी से मिल जाते हैं।

इसके अलावा हमारे भारत देश के नेता चाहे वो किसी भी पॉलिटिकल पार्टी से संबंधित हो ,सब को मिल के आवाज़ उठानी चाहिए और क़ानून बनाने चाहिए कि संसद और असेंबली में भी महिलाओं का 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो और इसमें परिवारवाद आगे नहीं आना चाहिए और अपने ही परिवार की महिलाओं को टिकट दिलाने में न लग जाएं।महिला प्रतिनिधित्व और हितों को सार्थक रूप दे ना की जुगाड़ू रूप।विश्व में कितने देश हैं जहाँ पर महिलाओं को 50% सुचारु रूप से हक़ दिया गया है और काफी देशों की सांसद महिलाएँ बख़ूबी बहुत अच्छे तरीक़े से बिना किसी भ्रष्टाचार के  अपना प्रतिनिधित्व का दम दिखाकर देश को आगे बढ़ा रही हैं।यदि आप आंकड़ों पर जाएंगे तो देखेंगे जहाँ जहाँ पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व है,वहाँ भ्रष्टाचार भी कम हैं और कार्य सुचारु रूप से ज़्यादा और अच्छे तरीक़े से होते है।इसके अलावा देश को आज ज़रूरत है,रेप के ख़िलाफ़ डेथ पेनल्टी की सजा करने की ताकि आए दिन होने वाली यह शर्मनाक घटनाएँ हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएं।देश की महिलाएँ डर में जी रही हैं और ख़ुद को सहज,सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती।उसके लिए ज़रूरत है समाज को शिक्षित बनाने की और साथ के साथ कठोर सजा का प्रावधान करने की ताकि उस उदाहरण से समाज में ऐसे क्रिमिनल्स का सफ़ाया हो पाए जो ये शर्मनाक कार्य करने की सोचते हैं और करते हैं ।और अंत में मैं कहना चाहूंगा कि पुरुष  पुरुषत्व की आड़ में महिलाओं को दबाने का घिनौना कार्य करके ये ना समझें कि यह पुरुष का अधिकार है या ऐसे इंसान को पुरुष कहलाने का हक़ है जो नारी की इज़्ज़त नहीं करता।उनको बराबर का हक़ दे सम्मान दें।अन्यथा आप इंसान कहलाने के लायक नहीं।यदि आज आप अपनी माँ,पत्नी,बहन की इज़्ज़त करते हैं तो कल को आपकी बेटी को भी उतनी ही इजाज़त मिलेगी,इस सोच के साथ आगे बढ़ें और महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी आवाज़ उठाएँ और उसके हकों को स्वीकार करें।

जय हिंद जय भारत

नारी का सम्मान

भारत की पहचान 

एडवोकेट हिमांशु देशवाल (मोंटी) 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।) 

 

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