पंजाब सरकार शराब को नशा मानती है या नहीं? बेलन ब्रिगेड ने किया सीधा सवाल
5 दरिया न्यूज
लुधियाना 10-Jul-2014
भारत एक धर्म परायण देश है सभी धर्म नशे से दूर रहने के लिए शिक्षिया देते है। लम्बे समय से बेलन ब्रिगेड ने नशो के खिलाफ एक जोरदार अभियान छेड़ कर सेमीनार करके, मीडिया दोवारा व घर घर गाँव गाँव जा कर लोगो को नशे के खिलाफ जागरूक किया। बेलन ब्रिगेड ने पंजाब सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सीधा सीधा सवाल किया है कि सरकार शराब को नशा मानती है या नहीं? अगर सरकार शराब को नशा नहीं मानती तो आम जनता को समझाये कि शराब कोई नशा नहीं है और अगर मानती है तो शराब के ठेकों को तुरंत बंद करे।शराब की बोतल के लेवल ऊपर यह लिखना काफी नहीं है कि शराब सेहत के लिए हानिकारक है सरकार की जिमेवारी यही खत्म नहीं हो जाती।
बेलन ब्रिगेड की प्रमुख अनीता शर्मा ने आज सर्कट हाऊस में मीडिया से बात करते हुए इस मुद्दे पर कई सवाल उठाये और स्पष्ट कहा कि आम आदमी नशे की शुरुआत शराब के पीकर ही करता है और धीरे धीरे सिंथेटिक ड्रग्ज़ तक पहुँच जाता है। सरकार स्पष्ट करे कि शराब नशा है की नहीं ?यदि शराब नशा है तो सरकार इस में हर साल ३५% की बढ़ोतरी क्या सोच कर कर रही है। आंकड़े बताते कि शराब की बिक्री से करोड़ों रूपये की आमदनी लेने वाली जनता की ज़िंदगी और परिवारों को तबाह कर रही हैं। उन्होंने कहा कि दिन भर मेहनत मज़दूरी व्यक्ति जब महंगाई और टैक्सों की मार के घबरा जाता है तो वह शराब में राहत ढूंढने का वहम पालता है और परिणाम स्वरूप उसकी रही सही जेब भी खाली करवा के घर लौटता है। उसे शराबी हालत में गिरते पड़ते और चीखते चिल्लाते देख कर घर के बच्चे सहम जाते हैं, परिवार के लोग चिंतित हो जाते हैं और आस पड़ोस वाले घृणा करने लगते हैं पर शराबी को कौन समझाये की शराब एक ज़हर है। जिस शराब को व्यक्ति अपना गम भूलने के लिए पीता है दूसरी तरफ सरकार उसी शराब को बेच कर करोड़ों रुपये कमाती हैं फिर ऊपर से उनकी भलाई और नशा मुक्त समाज बनाने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करने का दावा करती हैं। शराबी किसी भयानक बीमारी का शिकार हो जाता है तो सरकारी अस्पतालों में उनका इलाज नहीं होता। धीरे धीरे यही बीमारी कैंसर बन जाती है। तब सरकार उसे शराब की कमाई में से कैंसर फंड भी देती है लेकिन फिर भी वह बच नहीं पाता। शराब उसे मौत बन के निगल लेती है। पूरा घर परिवार उजड़ जाता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, पत्नी विधवा हो जाती है और मां बाप से बुढ़ापे का सहारा छीन जाता है। इस तरह सरकार अपनी कमाई के लिए लोगों की ज़िंदगी को नरक बनाये जा रही है। नशा मुक्ति के विज्ञापनों, नशा मुक्ति के अस्पतालों और नशा मुक्ति अभियानों के कि नशे की जड़, नशे की शुरूआती लत को ही बंद कर दिया जाये। आग लगाकर उसे बुझाने का ड्रामा आखिर कब तक चलेगा?
बेलन ब्रिगेड ने मांग की कि शराब के ठेकों को बंद करने की शुरुआत आज से ही होनी चाहिए। कम से कम 75% तो पहले चरण में ही बंद हो जाने चाहिएं। सरकार को याद रखना होगा कि सड़क दुर्घटनाओं, चैन पर्स स्नैचिंग चोरी डाके जैसे बढ़ रहे जुर्मों, लड़कियों से छेड़खानियों और घरों के क्लेश के लिए सरकार के ये शराब के ठेके भी ज़िम्मेदार हैं। सरकार को इन परिवारों की बददुयाओं से डरना चाहिए। लोगों को मौत के मुँह में धकेल कर अपने खज़ाने भरने वाली सरकार भी कभी सुख शांति से नहीं चल सकती। ऐसी सरकारें डंडे के दम पर चाहे शासन कर लें लेकिन लोगों में अपना स्थान हमेशां के लिए खो बैठती हैं। मैडम अनीता शर्मा ने शराब को एक नान वैज सूप बताया की इसे पीने के बाद शराबी को ड्रग्ज़ लेने में भी कोई हिचकचाहत नहीं होती। इसलिए समाज की खराबियों की मुख्य जड़ के बारे में राज्य और केंद्र सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करें। या इसका समर्थन करें या इसका विरोध करें। इनका दोगला चेहरा अब ज़्यादा देर तक चलने वाला नहीं।