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सुधार, समायोजनीयता और संकल्प : 2025 में भारतीय अर्थव्यवस्था

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चंडीगढ़ 29-Dec-2025

पिछले पांच वर्षों में आए कई वैश्विक झटकों ने दुनिया भर में अस्थिरता और अनिश्चितता का माहौल पैदा किया है। साल 2025 अब तक भू-राजनीतिक बिखराव, व्यापारिक अनिश्चितता, आपूर्ति शृंखला में बदलाव और तकनीकी वर्चस्व की जंग के नाम रहा है। दुनिया के इस अशांत माहौल के बीच, भारत की सूक्ष्म अर्थव्यवस्था  सबसे अलग दिखती है। 

हालिया तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 प्रतिशत रही है, जिसने बड़े-बड़े जानकारों के अनुमानों को भी पीछे छोड़ दिया है। राहत की बात यह है कि महंगाई और राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है। तमाम बाहरी चुनौतियों के बावजूद, भारत की नीतियों का मुख्य उद्देश्य घरेलू अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत और लचीला बनाना रहा है।

किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की असली बुनियाद घरेलू मांग होती है। करोड़ों भारतीय परिवारों के लिए कर नीतियों में बदलाव, खपत बढ़ाने का एक बड़ा जरिया साबित हुआ है। इस साल भारत ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के टैक्स सुधारों को अपनाया है। फरवरी में पेश किये गए बजट में 12 लाख रुपये तक की सालाना आय को टैक्स-मुक्त किया गया था जिससे लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा आया, साथ ही पुराने जटिल कानूनों की जगह नया 'आयकर अधिनियम 2025' लागू किया गया। 

इसके बाद सितंबर में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को और आसान बनाते हुए इसे दो स्लैब में रखा गया। इन सुधारों का असर यह रहा कि त्यौहार के सीजन में 6 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बिक्री हुई। खास बात यह है कि टैक्स में राहत देने से सरकारी खजाने को नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि बाजार में बढ़ी मांग और खपत के कारण आने वाले समय में टैक्स संग्रह के और बढ़ने की उम्मीद है। 

हमारी अर्थव्यवस्था का करीब 55-60 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत पर आधारित है। जैसे-जैसे खपत बढ़ती है, उद्योगों की उत्पादन क्षमता का भी बेहतर इस्तेमाल होने लगता है। जब उत्पादन अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच जाता है, तो अर्थव्यवस्था में निवेश भी बढ़ता है, जिसके कई सकारात्मक प्रभाव होते हैं। उपभोक्ता मांग लंबे समय तक तभी बनी रह सकती है जब लोगों की आय में भी लगातार बढ़ोतरी हो,  श्रम कानूनों में किये गए सुधार यह सुनिश्चित करेंगे। 

29 पुराने और बिखरे हुए कानूनों की जगह चार आधुनिक श्रम संहिताएं लागू होने से अब भारत का श्रम ढांचा व्यवसायों के लिए अधिक पारदर्शी और श्रमिकों के लिए अधिक सुरक्षित हो गया है। इन कानूनों का मुख्य जोर उचित वेतन, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों की सुरक्षा पर है। ये बदलाव यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारा 64 करोड़ का विशाल कार्यबल समृद्ध बने और भारत की विकास गति को और तेज बनाये।

जैसे-जैसे परिवारों की आय बढ़ेगी, उनके पास ज्यादा खर्च करने या बचत करने या फिर दोनों के विकल्प होंगे। संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ने से भविष्य निधि, पेंशन और बीमा कोष में निवेश बढ़ेगा। दुनिया भर में इस तरह के कोष घरेलू पूंजी बाजारों के लिए पूंजी का एक बड़ा स्रोत होते हैं, क्योंकि ये कंपनियों, परियोजनाओं या सरकारी बॉन्ड में ऋण और इक्विटी के रूप में निवेश किए जाते हैं। 

बीमा क्षेत्र में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने से भारत का पूंजी बाजार और मजबूत होगा, साथ ही प्रतिस्पर्धा और सेवाओं की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाना न केवल एक वित्तीय सुधार है, बल्कि यह सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम है।

मांग के जरिए निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ, इस साल देश में निवेश का माहौल भी काफी बेहतर हुआ है। जीएसटी सुधारों का मकसद केवल टैक्स दरों को सही करना ही नहीं था, बल्कि इससे पंजीकरण और नियमों के पालन की प्रक्रिया भी काफी आसान हो गई है। अब छोटी कंपनियों के लिए पंजीकरण के समय को 90 प्रतिशत तक घटा दिया गया है यानि 30 दिनों की बजाए अब पंजीकरण का समय महज 3 दिन कर दिया गया है। 

इसी तरह 'सिक्योरिटी मार्केट कोड' से भारतीय पूंजी बाजारों के कामकाज में पारदर्शिता आएगी, ग्राहकों के हितों की रक्षा होगी और कागजी कार्रवाई का बोझ कम होगा। स्वायत नियन्त्रक भी विकास की राह आसान बना रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, रिजर्व बैंक ने अपने 9,000 से ज्यादा सर्कुलरों को घटाकर 250 से भी कम कर दिया है। 

वहीं, भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (ईआरडीएआई) ने भी बीमा क्षेत्र में सुधारों के लिए एक कमेटी का गठन किया है। पर्यावरण और निर्माण नियमों में भी बड़े सुधार किए गए हैं, जिसके तहत अब सभी के लिए एक जैसे नियम के बजाय जोखिम के आधार पर नियम तय किए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, हर जगह 33% ग्रीन क्षेत्र की अनिवार्यता खत्म होने से 1.2 लाख हेक्टेयर औद्योगिक जमीन खाली हो जाएगी। 

अब औद्योगिक पार्कों में स्थित उन इकाइयों को अलग से पर्यावरण मंजूरी नहीं लेनी होगी, जिनके पास पहले से ही व्यापक अनुमति ली हुई है। इसके अलावा, कम जोखिम वाले उद्योगों के लिए एक नई 'श्वेत श्रेणी' (व्हाइट कैटेगरी) बनाई गई है, जिससे उनके लिए नियमों का पालन करना सस्ता और आसान हो जाएगा। इससे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले और ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।

जन विश्वास सुधारों के तहत 200 से अधिक छोटे-मोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है और सैकड़ों पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म कर दिया गया है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए, कई राज्य सरकारें भी 1,000 से अधिक नियम उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिए एक जुट हुई हैं। राज्यों ने जमीन, पर्यावरण मंजूरी और निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी प्रक्रियागत सुधार किए हैं, जिससे परियोजनाओं को मिलने वाली मंजूरी की रफ्तार तेज हुई है। 

अब जल्द ही 'जन विश्वास' का अगला चरण शुरू होने वाला है। ये तमाम बदलाव एक महत्वपूर्ण संकेत हैं कि भारत अब 'नियंत्रण' के बजाय 'भरोसे' पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। पास-पड़ोस में मची उथल-पुथल और अनिश्चितता के बावजूद, भारत के विकास लक्ष्यों के लिए व्यापार सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बना रहेगा। 

संसद के मानसून सत्र में, सरकार ने 1908, 1925 और 1958 के पुराने कानूनों को हटाकर भारत के समुद्री शासन (समुद्री क्षेत्र के प्रबंधन) का आधुनिकीकरण किया है। इन सुधारों के साथ ही भारत का समुद्री शासन ढांचा अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर आ गया है। कागजी कार्रवाई में कटौती और सुदृढ़ शासन से लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, जिससे भारतीय प्रतिस्पर्धिता बढ़ेगी। 

दूसरी बड़ी बात यह है कि 200 से अधिक गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ) को हटाए जाने से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और निर्यातकों के सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया है। इसके साथ ही, हमने अपने निर्यातकों के लिए नए बाजारों के दरवाजे भी खोल दिए हैं। ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ हुए व्यापार समझौतों के साथ-साथ यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ हुए करार के लागू होने से भारतीय निर्यात को एक नई मजबूती मिली है।

रोजगार के अवसर और निर्यात की मजबूती बड़े स्तर की कंपनियों से ही आती है। लंबे समय तक हमारी नीतियां ऐसी रहीं जिनसे कंपनियों को छोटा बने रहने में ही फायदा दिखता था, लेकिन छोटा रहने का मतलब था कि कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन के फायदों का लाभ नहीं उठा पा रही थीं। अब पांच साल में दूसरी बार एमएसएमई की सीमा को बढ़ाया गया है। 

अगर 2020 से पहले की परिभाषा से तुलना करें, तो यह सीमा अब 10 गुना बढ़ चुकी है। इस बदलाव से कंपनियां सरकारी मदद का लाभ लेते हुए भी बढ़ने में मदद मिलती है। इसके साथ ही, निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 20,000 करोड़ रुपये का एक नया मिशन शुरू किया गया है, जो विशेष रूप से एमएसएमई  की मदद करेगा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)और संबंधित बुनियादी ढांचे जैसी डेटा सेंटर में बढ़ते निवेश के कारण ऊर्जा खपत में ज़बरदस्त उछाल देखा जा रहा है। पिछले कुछ ही दिनों में भारत ने इस क्षेत्र में 70 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश प्राप्त किया है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा एक संवहनीय  विकल्प बनकर उभरी है। 

इसी को देखते हुए संसद ने शीतकालीन सत्र में 'शांति' (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) विधेयक पारित किया गया है। यह एक बड़े बदलाव का संकेत है, क्योंकि भारत स्वेच्छा से राज्य-एकाधिकार मॉडल से हटकर सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले और निवेश के अनुकूल ढांचे की ओर बढ़ रहा है। 

नए कानून के तहत अब नागरिक परमाणु परियोजनाओं में निजी और विदेशी कंपनियां भी हिस्सेदारी कर सकेंगी, जबकि  ईंधन, संवर्धन और पुनःप्रसंस्करण और हथियार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सरकार के नियंत्रण में ही रखा गया है। सुधारों का यह सिलसिला केवल आर्थिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण रोजगार कानून में सुधार करके अब काम की गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। 

नया कानून केवल राहत देने के बजाय उत्पादक रोजगार पर केंद्रित है जिसके तहत मजदूरी को जल सुरक्षा, जलवायु संरक्षण और बुनियादी ढांचे जैसे स्थायी निर्माण कार्यों से जोड़ा गया है। वहीं शिक्षा के क्षेत्र में 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान अधिनियम' के जरिए एक बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। इसके तहत यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई जैसे कई एक ही तरह का काम कर रहे निकायों की जगह एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक बनाया गया है। 

नई शिक्षा नीति के अनुरूप किए गए इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य फंडिंग और विनियमन को अलग-अलग करना है, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जा सके। अस्थिरता और अनिश्चितता के बीच भारत मजबूती से डटा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में साल 2025 बड़े और निर्णायक सुधारों के वर्ष के रूप में दर्ज हुआ है, जिसकी मुख्य पहचान भरोसा, सरलता और पूर्वानुमेयता है। 

ये सुधार आसान नहीं थे; इन्हें लागू करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति और राजनीतिक साहस की जरूरत थी। ये बदलाव एक बुनियादी आर्थिक सच को स्वीकार करते हैं कि सतत विकास केवल वित्तीय राहत या मौद्रिक प्रोत्साहन पर ही नहीं, बल्कि संस्थागत गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है। अब राज्य सरकारों की बारी है कि वे भी इसी दिशा में कदम बढ़ाएं। लेखक पूर्व जी 20 शेरपा और नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी  हैं। लेख में व्यक्त लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

लेखक : श्री अमिताभ कांत