5 Dariya News

जीएनडीयू के हिंदी-विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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अमृतसर 23-Apr-2025

केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय (उच्चतर शिक्षा विभाग), भारत सरकार, नयी दिल्ली और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी-विभाग के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'भारतीय ज्ञान प्रणाली : एक बहुआयामी विरासत' का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. (डॉ.) करमजीत सिंह ने की। 

उद्घाटन-वक्तव्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नयी दिल्ली के निदेशक प्रो.(डॉ.) सुनील बाबुराव कुलकर्णी ने दिया। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति पद्मश्री प्रो.(डॉ.) हरमहेंद्र सिंह बेदी बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, हरियाणा सरकार, पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) कुलदीप अग्निहोत्री मौजूद रहे। हिंदी विभाग के अध्यक्ष और डीन,भाषा संकाय प्रो. (डॉ.) सुनील कुमार ने बतौर संगोष्ठी संयोजक विषय प्रवर्तन किया और स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया। 

संगोष्ठी की शुरुआत  हंसराज महिला महाविद्यालय,जालंधर के हिंदी विभाग की छात्राओं द्वारा हिंदी भाषा के महत्व पर तैयार किए गये नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति से हुई जिसे दर्शकों की खूब सराहना मिली। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के माननीय उप-कुलपति प्रो.(डॉ.) करमजीत सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि पंजाब की धरती पर ही संसार के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद की रचना हुई। 

यजुर्वेद संहिता, अथर्ववेद संहिता और सामवेद संहिता का निर्माण स्थल भी पंजाब है। भारतीय संस्कृति के दो मूलाधार ग्रंथों-महाभारत और गीता की रचना भी इसी भूमि पर हुई। पंजाब में संत साहित्य की विशिष्ट परंपरा है, गुरुवाणी का विशेष महत्व है। समूचे हिंदी साहित्य की समृद्धि में पंजाब का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है और हिंदी साहित्य इसके लिए पंजाब का ऋणी रहेगा। संगोष्ठी संयोजक और हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि हिंदी देश की जीवन रेखा है।

प्राण शक्ति है। हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं वरन एक संस्कृति भी है जिसमें समाया है हिंदुस्तान। हिंदी बोलना या हिंदी पढ़ना-लिखना एक बड़ा दायित्व है। हिंदी सेवा का मतलब है हिंदी के माध्यम से जिंदगी जीने वाले, सपने देखने वाले करोड़ों लोगों की सेवा। हिंदी की भारतीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत की कोई गली,सड़क, चौराहा या नुक्कड़ ऐसा नहीं है जहां हिंदी न हो। 

हिंदी मजबूरी की नहीं मजबूती की भाषा है। हिंदी आजादी के आंदोलन की भाषा है। हिंदी जन जन की है और जन जन हिंदी का है। हिंदी अपनों की भाषा है, सपनों की भाषा है, पूर्वजों की भाषा है।‌आज पूरा विश्व एक अनोखी ललक के साथ हिंदी की ओर देख रहा है क्योंकि हिंदी युद्ध का नहीं प्रेम का संदेशा है, भौतिकता का नहीं आध्यात्मिकता का पदार्थ पाठ है और विश्व इसी के लिए तो भटक रहा है।‌ 

उन्होंने कहा कि दुनिया का कोई ज्ञान-विज्ञान ऐसा नहीं है जिसकी जड़ें भारतीय ज्ञान परंपरा से न जुड़ी हों। उन्होंने कहा कि माननीय उप-कुलपति प्रो. (डॉ.) करमजीत सिंह के कुशल निर्देशन और प्रेरणा से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने के लिए इन साहित्यिक कार्यक्रमों का निरंतर आयोजन किया जा रहा है। 

पद्मश्री प्रो.(डॉ.) ने बतौर मुख्य अतिथि अपने वक्तव्य में कहा किकिसी भी राष्ट्र की समृद्धशीलता के इतिहास का रहस्य उस राष्ट्र के समृद्ध साहित्य की विरासत में छिपा रहता है। जिस राष्ट्र का साहित्य जितना समृद्ध होता है, वह राष्ट्र उतना ही समृद्ध और सशक्त माना जाता है। साहित्य का मुख्य उद्देश्य ज्ञान, बोध, मनोरंजन, लोक कल्याण और सृजनात्मकता को बढ़ावा देना है। 

देवों और ऋषि-मुनियों की परम पवित्र पुरातन भूमि भारतवर्ष में साहित्य सृजन का इतिहास बहुत ही प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। आदि कवि वाल्मीकि जी से लेकर वर्तमान के श्रेष्ठ रचनाकारों ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध और अक्षुण्ण बनाते हुए समय- समय पर अपनी श्रेष्ठ रचनाओं द्वारा समाज को नई दिशा देकर नव चेतना का संचार किया है।

'गुरु ग्रंथ साहिब' भारतीय संस्कृति का अनुपम ग्रंथ है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नयी दिल्ली के निदेशक प्रो.(डॉ.) सुनील बाबुराव कुलकर्णी ने कहा कि हमारे जीवन में मेहनत और सच्चाई के अलावा जीवन की और जितनी भी अच्छी बातें हैं, वे भारतीय ज्ञान परंपरा में मिलती हैं। भारतीय संस्कृति व्यक्ति के जीवन के अन्तर्बाह्य लोक से अवगत कराती है और इसमें घर, परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ मनुष्य-हृदय के राग- विराग का प्रवाह समाया है और वह अपने तमाम मानवीय संबंधों को मन के मोती की तरह से जीवन की लय में पिरोती चलती है‌।

भारतीय ज्ञान परंपरा, जिसे भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ भी कहा जाता है, भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान विरासत है। यह ज्ञान वेद, उपनिषद, शास्त्र, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, कला और प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, हरियाणा सरकार, पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) कुलदीप सिंह अग्निहोत्री ने कहा कि वेद, उपनिषद, पुराण, आगम और अन्य साहित्यिक रचनाएँ ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।शिक्षा प्रणाली और शिक्षण विधियाँ भी भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। 

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने और इसे शिक्षा प्रणाली में एकीकृत करने पर जोर देती है। इस नीति का उद्देश्य छात्रों में भारतीय ज्ञान के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उन्हें भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जोड़ना है। 

इस सत्र में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'भाषा' पत्रिका और 'देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण' पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस सत्र का संचालन शोधार्थी श्री रमन कुमार शर्मा द्वारा किया गया और आभार- ज्ञापन शोध-छात्रा श्रीमती पवन कुमारी द्वारा प्रस्तुत किया गया।

पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) सुखविंदर कौर बाठ ने की। इस सत्र में मणिपुर विश्वविद्यालय, इंफाल के हिंदी विभाग में प्रो. (डॉ.) एलाङबम विजय लक्ष्मी बतौर की प्रमुख उपस्थिति रही तथा भारतीय भाषा केंद्र, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो.(डॉ.) सुधीर प्रताप सिंह बतौर मुख्य अतिथि एवं लवली प्रोफेशनल विश्वविद्यालय, फगवाड़ा के हिंदी-विभाग में प्रो.(डॉ.) विनोद कुमार बतौर विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। 

इस सत्र का संचालन पी.जी.डी.टी. कार्यक्रम की छात्रा सुश्री श्भेता जरियाल ने किया और शोधार्थी श्री जसवंत सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, शैक्षणिक परिसर , अमरावती के हिंदी विभाग में अध्यक्ष प्रो.(डॉ.) मनोज पांडेय ने की। 

इस सत्र में शहजादा नंद कॉलेज, अमृतसर की प्राचार्या डॉ. रीना तालवार बतौर मुख्य अतिथि, जालंधर से शिरोमणि हिंदी साहित्यकार डॉ. अजय शर्मा बतौर विशिष्ट अतिथि और डीएवी कॉलेज,अबोहर के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ.अनुपाल भारद्वाज ने बतौर अतिथि वक्ता उपस्थित रहे। इस सत्र का संचालन शोधार्थी श्री अमरदीप सिंह ने किया तथा शोध-छात्रा सुश्री शशि कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन के तीसरे सत्र की अध्यक्षता पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो.(डॉ.) अशोक कुमार ने की। इस सत्र में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. नीरजा बतौर मुख्य अतिथि, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. शशिकांत मिश्रा बतौर विशिष्ट अतिथि और देशभगत विश्वविद्यालय, मंडी गोबिंदगढ़ के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अजय पाल सिंह बतौर अतिथि वक्ता उपस्थित रहे। 

इस सत्र का संचालन विभाग की एम.ए. (हिंदी), समस्तर-चार की छात्रा सुश्री निकिता शर्मा ने किया और एम.ए.(हिंदी), समस्तर-दो की छात्रा सुश्री भव्या ने धन्यवाद ज्ञापित किया। चौथे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के पंजाबी अध्ययन स्कूल के अध्यक्ष डॉ. मनजिंदर सिंह ने की। 

इस सत्र में शांति देवी आर्य महिला महाविद्यालय, दीनानगर के हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. पूनम महाजन बतौर मुख्य अतिथि, हिंदू महाविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ. दीप्ति बतौर विशिष्ट अतिथि और सरूप रानी महिला महाविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. संजय चौहान बतौर अतिथि वक्ता उपस्थित रहे। 

इस सत्र का संचालन डॉ. नेहा हंस ने किया और शोध-छात्रा सुश्री पायल ने धन्यवाद प्रकट किया। समापन सत्र की अध्यक्षता गुरु नानक दे विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) विनोद कीजिए तनेजा ने की। इस सत्र में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नयी सहायक निदेशक (भाषा) डॉ. अनुपम माथुर बतौर मुख्य अतिथि, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के दृश्य एवं प्रदर्शन कला विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा बतौर विशिष्ट अतिथि और हिंदू कन्या महाविद्यालय, धारीवाल के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार शर्मा बतौर अतिथि वक्ता उपस्थित रहे। 

इस सत्र का संचालन शोधार्थी श्री गुरशरन कुमार ने किया तथा शोध-छात्रा सुश्री अमनदीप कौर ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संगोष्ठी के सभी सत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में हिंदी भाषा और साहित्य, पर्यावरण, भारतीय साहित्य, नयी शिक्षा नीति, अनुवाद, इतिहास, राजनीति, धर्म, संस्कृति, जीवन-मूल्य, परिवार, ज्ञान-विज्ञान, कला एवं संगीत, योग, अध्यात्म एवं शारीरिक शिक्षा, आर्युवेद, लोक साहित्य, खगोल विज्ञान,जैव विविधता, मानवाधिकार, भारतीयता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रंगमंच एवं सिनेमा, भारतीय मिथक और महाकाव्य, शिक्षा पद्धति, भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता, अवधारणा एवं देन, पंजाब का हिंदी साहित्य आदि उप-विषयों पर सार्थक चर्चा की गयी और अनेक महत्वपूर्ण प्रपत्र प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत किए गये।

इस अवसर पर हिंदी विभाग के अध्यापकों डॉ. सपना शर्मा, डॉ. लवलीन कौर, श्रीमती पिंकी शर्मा सहित स्थायी लोक अदालत (पीयूएस), अमृतसर के चेयरमैन श्री नरेश मोदगिल, डी.आर.माडर्न स्कूल के प्रिंसीपल श्री रविन्द्र पठानिया, आर.वी.एस. हब की सीईओ श्रीमती रिद्धिमा अरोड़ा, साहिल अरोड़ा और एम.वाई.एल. के निदेशक श्री पुनीत सचदेव, डॉ. अमनदीप सिंह, डॉ. परमबीर सिंह मल्ली, डॉ. विशाल भारद्वाज, डॉ. सलोनी, डॉ. हरिंदर कौर, डॉ.बलजीत कौर रियाड़, डॉ. मेघा सलवान, डॉ. चंदन, डॉ.अशोक भगत, डॉ. कंवलदीप कौर, डॉ. यू.बी. गिल, डॉ. सुमनीत कौर, डॉ. डिम्पल शर्मा, डॉ. ज्योति गोगिया, डॉ. नीलू शर्मा, श्रीमती रमनदीप कौर, श्री रजनीश भारद्वाज, श्री विपन कुमार, श्री मनविंदर सिंह, श्री गुरमीत थापा, श्री मनप्रीत सिंह, डॉ. मनु शर्मा, डॉ. देवेन्द्र सिंह, डॉ. राजविंदर कौर, डॉ. सुरजीत कौर, डॉ. श्वेता, श्रीमती नीना, डॉ. सुमन लता, श्रीमती मीनाक्षी मेहरा, डॉ. पूनम, सुश्री सुनयना, डॉ. हरजीत सिंह ग्रोवर, श्रीमती गुरशरण कौर आदि उपस्थित रहे। 

देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में प्रतिभागियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। संगोष्ठी में डी.आर.माडर्न स्कूल, अमृतसर के विद्यार्थियों, हंसराज महिला महाविद्यालय, जालंधर और शांति देवी आर्य महिला महाविद्यालय, दीनानगर की छात्राओं ने विशेष तौर पर भाग लिया। 

उल्लेखनीय है कि कई मायनों में इस साहित्यिक महापर्व ने अपनी अमिट छाप छोड़ी।