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एक पैरामिलिट्री बल की व्यथा : नेहरू 1.0 से मोदी 2.0 तक : दीपिका देशवाल

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नई दिल्ली 15-Jul-2020

मैं आपका ध्यान उन सैनिकों की समस्याओं की ओर दिलाना चाहती हूँ जो सीमाओं की रक्षा के लिए दिन-रात, गर्मी और ठंड में अनवरत खड़े है। जो कश्मीर, उत्तर-पूर्व या नक्सल में लड़ रहे है और शहीद हो रहे है, लेकिन आज यह बल अपनी पहचान तथा भविष्य के लिए अपने भीतर ही लड़ रहे है। यह बेहद निराशाजनक है तथा बलों के लिए हानिकारक भी।

>>      मैं सीमा सुरक्षा बल का उदाहरण देना चाहूंगी। 1965 में इसका गठन पाकिस्तान के आक्रमण के बाद किया गया था जो फौज ना हो पर फौज से कम भी ना हो। शुरूआती कमांडिंग ऑफिसर सेना से तथा प्रशिक्षण सेना की तर्ज पर होने के कारण यह एक बेहतरीन बल के रूप में उभरा तथा सीमाओं पर, कश्मीर, उत्तर-पूर्व, पंजाब तथा नक्सल में स्वयं को साबित किया। तब यह बल छोटा था तथा मुख्यालय कम थे। राजनैतिक समस्याएं कम थी। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी भी कम थे तथा दोयम दर्जे के नहीं थे। हमेशा सेना के अधिकारियों द्वारा कमांड देना संभव नहीं था अतः आईपीएस अधिकारियों को डेपुटेशन की सुविधा दी गई जब तक सीमा सुरक्षा बल के अपने वरिष्ठ अधिकारियों का कैडर तैयार ना हो जाए। यह 70 का दशक था।

>>      समस्या तब शुरू हुई जब सीमाएं अशांत हुई तथा राज्यों में राजनैतिक समस्याएं पैदा हुई। आईपीएस के अवसर राज्यों में कम हुए, इनकी संख्या बढ़ी तथा योग्यता कम हुई। केन्द्रीय बलों में डेपुटेशन इन के लिए लूप लाइन तथा राजनैतिक समस्याओं से बचने का एक जरिया बन गया। पहले यह कमांडेंट/समादेष्टा रैंक पर भी आने को तैयार थे। सीमाओं पर कमांडेंट की जिम्मेवारी तय होनी शुरू हुई तब यह डीआईजी तथा ऊपर के रैंक लेने लगे। डीआईजी स्तर पर भी ऑपरेशनल दिक्कत  होने से यह इन पदों पर इच्छुक नहीं हैं, हालांकि आरामदेह सेक्टर जैसे जैसलमेर, बीकानेर, पंजाब अब भी इनकी मनपसंद पोस्टिंग में से है।

>>      आईपीएस अधिकारी राज्यों में नौकरी करके राजनीति का पुलिसिया पाठ पढ़ कर आते है जिसमें अपने फायदे के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाना शामिल है जबकि बीएसएफ के कैडर अधिकारी अपनी सीमाओं के कामों में उलझे रहे। आईपीएस अधिकारियों ने सोची-समझी साजिश के तहत सीमा सुरक्षा बल के कैडर को पनपने नहीं दिया तथा आईजी स्तर पर एचआर, इंटेलिजेंस तथा प्रशासन जैसी जगह पर कब्जा किया जिससे यह संपूर्ण सीमा सुरक्षा बल पर कब्जा कर सकें। आईपीएस एसोसएशन जैसी संस्थाओं ने इन्हें ऑर्गेनाइज किया वहीं बीएसएफ कैडर ऑफिसर आर्म्ड फोर्स एक्ट के तहत कोई एसोसिएशन ना बना सकें तथा इनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं हो सका। यह 90 का दशक था तथा केन्द्र में कमजोर सरकारें आई। राजनेता कमजोर होते गए तथा नौकरशाह मजबूत। सशस्त्र बल के कार्मिक जिनकी आवाज सरकार है, क्योंकि यह आंदोलन नहीं कर सकते, लोबिंग नहीं कर सकते थे। उस सरकार पर नौकरशाहों, आईपीएस का नियंत्रण था। अतः सरकार के सुनने का सवाल ही नहीं उठता था।

>>      आईपीएस अधिकारियों ने वही स्ट्रेटजी केन्द्रीय बलों में अप्लाई की जो अंग्रेजों द्वारा गुलाम भारत पर इस्तेमाल किया गया था जैसे-                                                                  >> -    सीमा सुरक्षा बल के चंद अफसरों को अतिरिक्त लाभ देकर रायबहादुर जैसा तमगा देकर कैडर में दरार डालना।

>> -    सक्षम अधिकारियों को उत्तर-पूर्व या नक्सल में लूप लाइन में रखना।

>> -    सीमा सुरक्षा बल अधिकारियों को कई मामलों में फंसाना तथा इंगेज रखना।

>> -    सीधी भर्ती अधिकारियों को स्टैटिक लोकेशन से दूर रखना ताकि वे जागरूक ना हो सकें।

>>      आईपीएस अधिकारियों द्वारा मनमाने तरीके से बल के संसाधनों का दुरूपयोग हुआ। उदाहरण राजस्थान जहां जवान अपने सर पर जनरेटर लेकर रेगिस्तान में चलते हैं ताकि आईपीएस आईजी रेत के टीलों पर नृत्य तथा संगीत का आनंद ले सकें। विद्रोह ना होने पाए उसके लिए जिस तरह अंग्रेेज सरकार डलहौजी के बाद रिपन को भेजती थी उसी प्रकार सीमा सुरक्षा बल में भी रमन श्रीवास्तव, सुभाष जोशी के बाद मरहम लगाने के लिए श्री कुमावत, श्री प्रकाश सिंह जैसे लोग भी भेजे गए।

>>      समय बदला और 2000 का दशक आया। अंग्रेजी शासन के अत्याचार का पानी सर के ऊपर जा चुका था। सीमा सुरक्षा बल के अपने कैडर अधिकारियों की जमीनी खेप तैयार हो चुकी थी। रायबहादुर या तो रिटायर हो चुके थे या आईजी और एडीजी बन चुके थे। पढ़े लिखे और काबिल लोग बल ज्वाइन कर रहे थे। सोशल मीडिया उन्हें जागरूक कर रहा था। स्थिर सरकार से हिम्मत मिल रही थी। इस हिम्मत ने इन्हें संगठित किया तथा सरकार तथा आईपीएस से कोई मदद ना मिलने पर कोर्ट की शरण ली। बहुत ही धीमा प्रमोशन, खराब आर्थिक स्थिति, सम्मान की कमी तथा आईपीएस के व्यवहार ने अंतिम लड़ाई की शक्ति दी।

>>      इसके फलस्वरूप 2019 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय बलों को ऑर्गेनाइज कैडर तथा OGAS के अंतर्गत लाने का आदेश दिया। इससे आईपीएस लॉबी तिलमिला उठी। आईपीएस एसोसिएशन न्यायालय के निर्णय को प्रभावित करने के लिए स्वयं एक पक्ष बना। कोर्ट का निर्णय आने के बाद भी आईपीएस लॉबी ने इसे रोकने की भरसक कोशिश की है। यह बेहद निराशाजनक है। केन्द्रीय बलों के अपने अफसर कमांड के लिए तैयार है। आर्म्ड फोर्स के कार्मिक हड़ताल नहीं कर  सकते। अतः यह सरकार का फर्ज है कि इन पहरेदारों के हितों की रक्षा करें। जिस देश में छोटा सा दल चंद व्यक्तियों के दम पर सड़क जाम करके अपनी बात मनवा लेते हैं वहां दस लाख के केन्द्रीय बलों को अपनी पहचान बनाने के लिए तरसना पड़ रहा है।

>>      आईपीएस जिन्हें बलों में स्नेह से इंडियन पैराशूट सर्विस के नाम से जाना जाता है एक बहुत ही प्रभावशाली तथा पहुंच वाली लॉबी है। इन्हें समस्या बल के अधिकारियों को NFFU फाइनेंशियल एडवांटेज से नहीं है बल्कि ऑर्गेनाइज कैडर या OGAS से है जिससे इनका डेपुटेशन बंद हो जाएगा तथा इन्हें अपने मूल राज्यों के प्रति ज्यादा जिम्मेवार होना पड़ेगा। आईपीएस का तर्क है कि इससे केन्द्रीय बलों का अखिल भारतीय स्वरूप नहीं रहेगा जबकि केन्द्रीय बलों में कार्मिक/अफसर देश के सभी हिस्सों से आते है।

>>      यदि बलों की लड़ाकू क्षमता और इन्हें नैराश्य में डूबने से बचाना है तो नौकरशाहों पर लगाम लगाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू करके बलों को  NFFU तथा OGAS तत्काल दिया जाए। यह बात बल के कार्मिक भी जानते हैं तथा पैराशूट सर्विस के अधिकारी भी कि सिर्फ आपकी सरकार इन पर लगाम लगा सकती है। इसका उदाहरण सभी आप की सरकार के पहले कार्यकाल में देख चुके है। मेरा मानना है कि आजादी के पहले भारतीयों में अंग्रेजों को देखकर जो भावना आती थी वही नफरत बल के कार्मिकों के भीतर इन नव-अंग्रेजों के लिए है।

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>> दीपिका देशवाल