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एसवाईएल को लेकर केंद्र भी अपना दायित्व निभाए : अशोक अरोड़ाएसवाईएल को लेकर केंद्र भी अपना दायित्व निभाए : अशोक अरोड़ा

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चंडीगढ़ 07-Jun-2017

इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है जिसमें उन्होंने हरियाण को नसीहत दी है कि वह पंजाब से बाचतीत कर एसवाईएल नहर निर्माण मुद्धे का समाधान करे। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी सलाह देकर गृह मंत्री अपने उस संवैधानिक दायित्व से मुक्त होना चाहते हैं जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय के नहर निर्माण संबंधी निर्णय को लागू करवाना उनका कर्तव्य है। अरोड़ा ने कहा कि गृहमंत्री के बयान से ऐसा लगता है कि हरियाणा ने बिना बातचीत के प्रयास किए ही न्यायायल का दरवाजा खटखटाया था। रावी-व्यास नदियों के अपने हिस्से के जल को हरियाणा की प्यासी धरती पर लाने के लिए हरियाणा ने धैर्य भी दिखाया है और सभी सम्भव प्रयास भी किए हैं। परंतु श्री राजनाथ सिंह के बयान से ऐसा आभास होता है कि बातचीत को समस्या के समाधान का साधन बनाने का सुझाव पहली बार उन्होंने ही राज्यों की उत्तरी क्षेत्र की परिषद में दिया था।

अरोड़ा ने याद दिलाया कि चालीस वर्ष पूर्व 1977 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल और तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल द्वारा बातचीत करने के बाद ही एक फैसला हुआ था, जिसके तहत चौधरी देवीलाल ने हरियाणा की तरफ से एसवाईएल नहर के निर्माण के लिए पंजाब को एक करोड़ रुपए दिलाए। बाद में पंजाब अपने वायदे से पीछे क्यों हटा, इसका उत्तर केवल पंजाब के पास है।श्री अरोड़ा ने कहा कि जब बातचीत के सभी मार्ग बंद हो गए, तभी यह मुद्दा जल पंचाट (ट्राईब्यूनल) को सौंपा गया था। परंतु उसके फैसले को भी जब स्वीकार करने से पंजाब ने मना कर दिया, तभी यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले के सभी पहलुओं और तर्कों को देखने और परखने के बाद अपना निर्णय हरियाणा के पक्ष में दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने निर्णय के तहत एसवाईएल नहर निर्माण कार्य की जिम्मेदारी केंद्र सरकार में उस सूरत में सौंपी थी जब पंजाब उसका निर्माण एक समय सीमा में न करवा सके। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने का संवैधानिक दायित्व केंद्र सरकार पर है। अपने इस दायित्व से केंद्र सरकार भाग नहीं सकती।इनेलो नेता ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद गृह मंत्री का कहना कि हरियाणा यह मामला बातचीत द्वारा सुलझा ले, उच्चतम न्यायालय का अपमान भी है और संविधान में सेंध भी लगाता है।